The aim of this blog is providing the information about the Indian scientist. By the help of these blog posts we know about the contribution and help which is provided by the Indian scientist to the all living beings included human being.
रविवार, 1 नवंबर 2020
सी. के. एन. पटेल
बुधवार, 23 सितंबर 2020
जे. वी. नार्लीकर
मंगलवार, 25 अगस्त 2020
एम. जी. के. मेनन
सोमवार, 10 अगस्त 2020
शम्भुनाथ डे
शम्भुनाथ डे
विज्ञान के इतिहास में शंभू नाथ डे का उदाहरण प्रतीकात्मक है |जब भी कभी कोई वैज्ञानिक प्रचलित विश्वासों के विरुद्ध कोई नई परिकल्पना या सिद्धांत प्रस्तावित करता है तो समसामयिकों द्वारा उसकी उपेक्षा की जाती है| असम्मानित और निरादृत ही वह मृत्यु को प्राप्त होता है| वर्षों बाद जब कोई अन्य वैज्ञानिक उसके विचार या परिकल्पना का निष्पक्ष रुप से परीक्षण करता है तो पता है कि उसकी बात सही थी| जॉर्ज मेंडल के आनुवंशिकता सिद्धांत विज्ञान के इतिहास में इसी प्रकार की एक प्रसिद्ध घटना है| शंभू नाथ डे के द्वारा हैजा फैलाने वाले जहरीले तत्व की खोज भारत के वैज्ञानिक इतिहास में एक जानी-मानी घटना है| सन 1985 में उनकी मृत्यु होने तक उनके काम को मान्यता प्रदान करना या सम्मानित करना तो दूर, वैज्ञानिक बिरादरी के चंद लोग ही उनकी खोजों के विषय में जानते थे| किंतु उनकी खोज हैजे के अनुसंधान कार्य में पथ प्रदर्शक थी और इस रोग से बचाव तथा इसके नियंत्रण के लिए मुख से दी जाने वाली वैक्सीन इसी खोज की देन थी|
डे का जन्म कोलकाता से 30 किलोमीटर उत्तर की ओर एक छोटे से गांव गरीबाटी में एक साधारण आय वाले व्यापारी के घर में सन 1915 में हुआ| गरीबाटी में स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद वे चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन के लिए कोलकाता गए | उन्हें उच्चतर शिक्षा के लिए छात्रवृत्तियां अवश्य मिलीं किंतु यह धन उनकी जरूरतों के लिए काफी नहीं था |उनके मधुर स्वभाव और तीक्ष्ण बुद्धि के कारण कुछ लोगों ने उन्हें अपने घर में टिकाने का प्रस्ताव रखा| वास्तव में एक प्रोफेसर डे, जो बाद में उनके ससुर बने आर्थिक और नैतिक रूप से उनकी बहुत सहायता करते रहे| विवाह के बाद डे लंदन विश्वविद्यालय में पीएचडी करने के लिए भेजे गए |
डे विदेश तो गए किंतु वहां कोई सार्थक काम नहीं कर पाने के कारण निराशा ही उनके हाथ लगी | अनुसंधान के विषय में वह अवश्य काफी कुछ सीख पाए | अपनी वापसी पर वह आत्मविश्वास से भरे हुए थे क्योंकि उन्हें सुव्यवस्थित रूप से अनुसंधान करने का तरीका मालूम था| वास्तव में हैजे की समस्या का निराकरण करने का विचार उन्हें लंदन में ही आया था और अनुसंधान के लिए आवश्यक उपकरण डे अपने साथ लेकर आए थे| नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज में नियुक्ति पाकर वह हैजे पर अनुसंधान में जी जान से जुट गए|
बहुत पहले सन 1883 में रॉबर्ट कोच ने हैजे का कारण एक ऐसा बैक्टीरिया बताया था जो मानव शरीर में भोजन और पानी के माध्यम से प्रवेश करता है| हैजे को फैलने से रोकने का एक ही तरीका था- साफ सफाई और स्वास्थ्य का ध्यान रखना| हैजे से ग्रस्त व्यक्ति शरीर के तरल पदार्थ और प्राण आधार लवणों को उल्टी और पेचिश में खो देता था और वह गुर्दे के क्षय तथा रक्तवह- तंत्र के जवाब देने से दर्दनाक मौत मरता था| वास्तव में एशिया, अफ्रीका और यहां तक कि यूरोप का इतिहास भी समय-समय पर सैकड़ों लोगों को मारने वाली हैजे की महामारी से भरा पड़ा है| भारत में भी हैजे की बीमारी स्वास्थ्य की देखरेख न करने और गंदगी के कारण आम थी| अपने देशवासियों के लिए अभिशाप बने हैजे पर डे ने अनुसंधान कार्य शुरू किया और उसके कारण को खोज निकाला| आरंभ में उन्होंने एक सरल सी किंतु नई तकनीक खोज निकाली जो हैजे से ग्रस्त व्यक्तियों के रोग लक्षणों को खरगोशों में दर्शाती थी|
इसके बाद क्रमबद्ध अन्वेषण से उन्होंने जाना कि हैजा किसी जीवाणु के द्वारा नहीं बल्कि जहरीले तत्व 'एन्टेरोक्सिन ' से होता है जिसका रिसाव मानव के पाचक - क्षेत्र में पाई जाने वाली परिस्थितियों में होता है| सन 1959 में प्रतिष्ठित ब्रिटिश वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में इनकी खोज का समाचार प्रकाशित हुआ था जो कि अगले 5 वर्ष तक किसी ने उनकी खोज खबर नहीं ली| आज इसे सारे विश्व में हैजे से संबंधित खोज की आधारशिला माना जाता है|
अध्यापन के भारी कार्य और मान्यता से विहीन प्रशासकीय कार्य के साथ डे ने न्यूनतम सुविधाओं, उपकरणों और धन से ही कोलकाता मेडिकल कॉलेज में अपना अनुसंधान जारी रखा |अक्सर शाम को कॉलेज बंद होने के बाद वह अपने पैसे खर्च करके अनुसंधान कार्य करते थे| कभी भी किसी सत्ताधारी से उन्होंने धन या सुविधाओं की याचना नहीं की| मृदुभाषी और विनम्र डे के थोड़े से मित्र और हितैषी थे, और अनुसंधान कार्य को शौक के रूप में उन्होंने मृत्यु- पर्यंत जारी रखा | एक घटना अवश्य हुई जिससे उन्हें हर्ष हुआ होगा| यह थी नोबेल फाउंडेशन द्वारा सन 1978 में हैजे पर विचार गोष्ठी आयोजित करना और उस में भाग लेने के लिए उनसे प्रार्थना करना| सन साठ के दशक में उनकी खोज को पश्चिम में मान्यता मिली और जहरीले तत्व की रासायनिक विशेषता को समझने का भी प्रयास होने लगा| साथ ही आणविक स्तर पर इसकी कार्यविधि समझने का भी प्रयत्न होने लगा जो इस बीमारी का निराकरण करने वाली वैक्सीन बनाने में आवश्यक था|
बुधवार, 29 जुलाई 2020
राजा रामन्ना
रविवार, 19 जुलाई 2020
श्रीनिवास रामानुजन
गणित की कक्षा चल रही थी |अध्यापक सिखा रहे थे | श्यामपट्ट पर तीन केले बने हुए थे |"हमारे पास तीन केले हैं," अध्यापक ने कहा," और तीन ही लड़के हैं| क्या तुम बता सकते हो कि प्रत्येक लड़के को कितने केले मिलेंगे?"
अगली पंक्ति में बैठे एक होशियार लड़के ने उत्तर दिया," प्रत्येक लड़के को एक केला मिलेगा|"
अध्यापक ने कहा," तुमने ठीक कहा|इसी तरह यदि 1000 केले हों और 1000 लड़कों में बांटे जाएं तो भी प्रत्येक लड़के को एक ही केला मिलेगा क्यों ठीक है ना?"
जब अध्यापक समझा रहे थे तो कोने में बैठे एक लड़के ने हाथ ऊपर उठाया और खड़ा हो गया| अध्यापक रुक गया और लड़के के बोलने की प्रतीक्षा करने लगा |लड़का बोला," जनाब यदि कोई केला किसी में ना बांटा जाए तो क्या तब भी प्रत्येक को एक केला मिलेगा|" कक्षा में सब हंस पड़े "क्या मूर्खता का प्रश्न है?"
अध्यापक ने जोर से मेज पर हाथ मारा और कहा," चुप हो जाओ इसमें हंसने की कोई बात नहीं है मैं समझाता हूं कि वह क्या कहना चाहता है| हमने केलों के बंटवारे में तीन को 3 से भाग किया फिर कहा कि प्रत्येक को एक केला मिलेगा| फिर हमने 1000 को 1000 से भाग दिया तब भी सबको एक केला मिला| वह पूछना चाहता है यदि शून्य केले को शून्य में बांटा जाए तो क्या तब भी प्रत्येक लड़के को एक केला मिलेगा| इसका उत्तर है 'नहीं'| गणित के अनुसार प्रत्येक को असंख्य केले मिलेंगे|"
लड़के फिर हंस पड़े| वह गणित के करतब को समझ कर हंसे थे लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आया कि बाद में अध्यापक ने उस लड़की की जिसने ऐसा बेकार सा प्रश्न पूछा था प्रशंसा क्यों की | लड़के ने ऐसा प्रश्न पूछा था जिसका उत्तर देने में गणितज्ञों को शताब्दीया लग गई| कुछ गणितज्ञों का कहना था कि शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य आता है| लेकिन अन्य कहते थे कि यह एक होता है| जिस लड़के ने यह उलझन भरा प्रश्न पूछा था उसका नाम था श्रीनिवास रामानुजन| अपने पूरे जीवन में, चाहे अपने जन्मस्थान कुंबकोणम में रहे या विदेश के कैंब्रिज में वह सदा अपने गणित के अध्यापकों से आगे रहते|
रामानुजन का जन्म तमिलनाडु के इरोद नामक स्थान पर 22 दिसंबर 1887 में हुआ| उनके पिता कपड़े की एक दुकान में मुनीम थे| बचपन से ही यह स्पष्ट था कि रामानुजन विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं| वरिष्ठ छात्र उनसे गणित के प्रश्न हल करवाने उनके छोटे से मकान में आते| 13 वर्ष की आयु में रामानुजन एक कॉलेज लाइब्रेरी से लोनी की त्रिकोणमिति की पुस्तक ले आए| उन्होंने न सिर्फ इस कठिन पुस्तक को पढ़ा और समझा, बल्कि अपना शोध कार्य भी आरंभ कर दिया| उन्होंने उन कई प्रमेय और फार्मूला का पता लगाया जो पुस्तक में दिए नहीं गए थे, यद्यपि उनकी खोज पहले के प्रसिद्ध गणितज्ञों ने की थी|
एक सबसे महत्वपूर्ण बात 2 वर्ष बाद हुई जब उनके एक वरिष्ठ मित्र ने उन्हें जॉर्ज शूब्रिज कार की 'सिनॉप्सिस आफ एलिमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड अप्लाइड मैथमेटिक्स' दिखाई| 15 वर्ष के लड़के के लिए यह शीर्षक ही डरा देने वाला होना चाहिए था| मगर रामानुजन इसे पाकर बहुत प्रसन्न हुए| वह पुस्तक को घर ले गए और उसमें दिए प्रश्नों को सुलझाने में लग गए| इस पुस्तक ने उनकी गणित की प्रतिभा को प्रेरित किया| गणित के बारे में उनके मस्तिष्क में इस तेजी से विचार आने लगे कि उन सबको लिखना भी कठिन हो गया| वह प्रश्नों को खुले पन्नों में या स्लेट पर करते और परिणाम नोटबुक में लिखते | विदेश जाने से पहले उन्होंने तीन नोटबुके भर डाली थीं, जो बाद में रामानुजन की 'फ्रेयड नोटबुक्स' के नाम से प्रसिद्ध हुई| आज कल भी गणितज्ञ उनका अध्ययन कर रहे हैं जिससे उसमें दिए परिणामों को प्रमाणित या उनका खंडन कर सकें|
यद्यपि दसवीं की परीक्षा में रामानुजन गणित में प्रथम श्रेणी में पास हुए और उन्हें सुब्रमण्यन छात्रवृत्ति भी मिली| लेकिन कॉलेज में आर्ट्स प्रथम वर्ष में ही 2 बार असफल हुए क्योंकि उन्होंने इतिहास, अंग्रेजी और शरीर विज्ञान पर ध्यान नहीं दिया था| उनके पिता को बड़ी निराशा हुई जब उन्होंने उन्होंने देखा कि रामानुजन सारा समय संख्याएं लिखते रहते हैं और कुछ नहीं करते| उन्होंने सोचा कि रामानुजन पागल हो गया है| उसका पागलपन हटाने के लिए उन्होंने जबरदस्ती बेटे का विवाह कर दिया| उनकी पत्नी के रूप में 8 वर्ष की बालिका जानकी को चुना| अब रामानुजन नौकरी की फिराक में रहने लगे| उन्हें केवल रोटी के लिए ही रुपया नहीं चाहिए था, गणित के प्रश्न हल करने के लिए कागजों के लिए भी पैसा चाहिए था| हर महीने उन्हें 2000 कागज चाहिए होते थे| रामानुजन सड़क पर पड़े कागज के टुकड़ों का भी प्रयोग करने लगे| कभी कभी तो उसी कागज पर जिस पर पहले नीले से लिखा होता, लाल स्याही से लिखने लगते| मैंले और बिखरे बालों के साथ वह दफ्तरों में जाते और कहते थे कि उन्हें गणित आता है और वह क्लर्क का काम कर सकते हैं| वह अपनी फ़टी पुरानी कॉपी दिखाते लेकिन कोई भी कॉपियों में क्या लिखा है समझ नहीं पाता था और उनका प्रार्थना पत्र अस्वीकार कर दिया जाता|
सौभाग्य से उन्हें एक बार ऐसा व्यक्ति मिला जो उनकी नोटबुक से बड़ा प्रभावित हुआ|वह व्यक्ति मद्रास पोर्ट ट्रस्ट का निदेशक फ्रांसिस स्प्रिंग था| उसने ₹25 प्रति माह के वेतन पर रख लिया| इसके बाद कुछ अध्यापक और शिक्षा शास्त्री भी रामानुजन के काम में दिलचस्पी लेने लगे और उन्होंने उनको शोध शिक्षावृत्ति दिलाने का प्रयास किया| 1 मई 1913 को मद्रास विश्वविद्यालय ने रामानुजन को ₹75 की शिक्षावृत्ति दे दी यद्यपि उनके पास कोई डिग्री नहीं थी|
कुछ महीने पहले रामानुजन ने कैंब्रिज के प्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी को पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने 120 प्रमेय और फार्मूले भेजे थे| उन्हीं में वह भी था जिसे रेमान श्रृंखला के नाम से जाना जाता है| यह विषय डेफिनेट इंटीग्रल कैलकुलस का है लेकिन उन्हें पता नहीं था कि जर्मन गणितज्ञ जार्ज एफ .रेमान पहले ही यह श्रृंखला बना चुके थे| यह एक दुर्लभ उपलब्धि थी| पत्र में उस किस्म की इक्वेशनों के बारे में रामानुजन के अनुमान भी थे जिन्हें मॉडलर कहते हैं| पिअरी डैलने ने हाल में ही उनके अनुमान को सही प्रमाणित कर दिया है| रामानुजन ने एक हाइपर जियोमेट्रिक श्रृंखला में एक फार्मूला भी दिया जो बाद में उनके नाम से विख्यात हुआ|
हार्डी और उसके साथी जे.ई .लिटलवुड को जानने में ज्यादा देर नहीं लगी कि रामानुजन गणित में दुर्लभ प्रतिभा संपन्न है| उन्होंने रामानुजन के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय आने और ठहरने का प्रबंध कर दिया| और वह 17 मई 1915 को पानी के जहाज द्वारा ब्रिटेन के लिए रवाना हुए|
कैंब्रिज में रामानुजन ने अपने आपको अजनबी पाया| कड़ी सर्दी सहना कठिन था और वह ब्राह्मण और शाकाहारी होने के कारण अपना भोजन स्वयं पकाते थे| फिर भी दृढ़ निश्चय होकर वह गणित में अपना शोध कार्य करते रहे| हार्डी और लिटिलवुड की संगति में वह अपनी कठिनाइयों को भूल जाते थे|
रामानुजन में हार्डी को एक और व्यवस्थित गणितज्ञ मिला| ऐसा जो पाइथागोरस थ्योरम तो जानता हो मगर कोनगुरंट त्रिकोण का उसे पता ना हो| उनके शोध में कई गलतियां इनकी औपचारिक शिक्षा पूरी ना होने के कारण थी| रामानुजन अंकों से ऐसे खेलते थे जैसे बच्चा अपने खिलौने से खेलते हैं| यह उनकी शुद्ध प्रतिभा ही थी जो उन्हें गणित की सच्चाई पर पहुंचा देती थी| उन्हें प्रमाणित करना भी विज्ञान में जरूरी है और वह कार्य उन्होंने अपने से कम प्रतिभाशाली लोगों पर छोड़ दिया|
28 फरवरी 1998 को उन्हें रॉयल सोसाइटी का सदस्य चुन लिया गया |वह दूसरे भारतीय थे जिन्हें इस विशिष्ट सदस्यता का सम्मान मिला था| अक्टूबर में ट्रिनिटी कॉलेज कैंब्रिज के सदस्य बने|वह पहले भारतीय थे जिन्हें यह सम्मान मिला| कैंब्रिज में उनकी उपलब्धि थी हार्डी- रामानुजन लिटलवुड सर्किल मेथड इन नंबर थ्योरी , रोजर - रामानुजन आईडेंटिटी इन पार्टीशन ऑफ़ इंटिगर्स ,सर्वोच्च (हाईएस्ट) कंपोजिट नंबरों की एक लंबी सूची इसके अतिरिक्त उन्होंने बीजगणित में अंक सिद्धांत और असमता का बीजगणित पर भी काम किया| बीजगणित में वितित भिन्न( कंटिन्यूड फ्रेक्शंस) पर उनके कार्य को गणितज्ञ लियोनार्ड यूलर और जेकोबी की बराबरी पर रखा जाता है|
जब रामानुजन अपना शोध कार्य कर रहे थे, तपेदिक- तब इस बीमारी का इलाज नहीं था उन्हें खा रहा था| रामानुजन को वापस भारत भेज दिया गया| जब वह जहाज से उतरे तो उनके मित्रों ने उन्हें पीला, थका हुआ और कमजोर पाया| अपनी बीमारी के दर्द को भूलने के लिए वह मृत्यु निकट होने पर भी अंको से खेलते रहे|
26 अप्रैल 1920 को चेटपेट मद्रास में उनकी मृत्यु हो गई|
गणितज्ञ होने के साथ-साथ रामानुजन प्रसिद्ध ज्योतिषी और अच्छे वक्ता भी थे| वह 'भगवान, शून्य अनंत' जैसे विषयों पर भाषण देते थे|
सोमवार, 13 जुलाई 2020
सालिम अली
एक धमाका! एक पक्षी कुछ क्षण तक फड़फड़ाया और फिर जमीन पर गिर पड़ा| एक 10 वर्षीय चश्माधारी बालक जिसने पक्षी पर गोली चलाई थी, भाग कर आया और उसे उठा लिया| पक्षी गौरैया चिड़िया जैसा लगता था मगर यह देखकर बालक को आश्चर्य हुआ कि उसके गले पर पीला धब्बा था| दुविधा में पड़कर बालक उस पक्षी को अपने चाचा अमीरुद्दीन तैयबजी जो खूंखार जानवरों के शिकारी थे, के पास ले गया और पूछा कि यह किस किस्म की चिड़िया है? उसके चाचा इस बारे में कुछ नहीं जानते थे| लेकिन वह बालक को बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के ऑफिस में ले गए-- अपोलो स्ट्रीट पर एक बड़े भवन में एक छोटा सा कमरा| लड़के का परिचय डब्लू. एस. मिलार्ड से, जो सोसाइटी के अवैतनिक सचिव थे, से कराया गया |
मिलार्ड को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि एक भारतीय लड़का पूछ रहा है कि उसने कौन सी है चिड़िया मारी है |वह उसे उस कमरे में ले गए जहां तरह तरह के मरे हुए पक्षियों के शरीरों में भूसा भरकर रखा हुआ था| एक के बाद दूसरे दराज खोले गए और तरह तरह की चिड़िया दिखाई गई |लड़के ने शायद यह कल्पना भी नहीं की थी कि पक्षी भी इतने प्रकार की होते हैं|
वह आश्चर्यचकित देखता रहा जब मिलार्ड ने एक दराज खोला जिसमें तरह-तरह की गौरैया रखी थी| सावधानी से देखकर मिलार्ड ने एक मरा हुआ पक्षी उठाया| वह पक्षी बिल्कुल वैसा ही था जैसा बालक अपने साथ लाया था| यह एक नर बया पक्षी था| वह केवल वर्षा ऋतु में ही पहचाना जा सकता है जब उसके गले पर पीला धब्बा उभर आता है|
लड़के ने विस्मित होकर कहा मिलार्ड अंकल, मुझे नहीं पता था कि इतनी तरह के पक्षी होते हैं| मैं उनके बारे में सीखना चाहता हूं| मिलार्ड ने मुस्कुराकर सिर हिलाया|उन्होंने अब तक पक्षियों के बारे में जानने के लिए किसी वयस्क में भी विशेष उत्साह नहीं देखा था| उसके पश्चात वह बालक प्रायः वहां आने लगा| वह सीखने लगा कि पक्षियों को कैसे पहचाना जाता है |बड़े पक्षी को सुरक्षित रखने के लिए उनके शरीर को कैसे भरा जाता है|
इस बालक का नाम था सलीम मोइजुद्दीन अब्दुल अली जिन्हें सारा संसार असाधारण पक्षी प्रेमी सालिम अली के नाम से जानता है| उनका जन्म 12 नवंबर सन 1896 में हुआ था| अपनी उम्र के नवें दशक में पहुंचकर भी पक्षियों में उनकी रुचि वैसे ही है जैसे तब थी जब वह पहले पहल मिलार्ड से मिले थे| उन्होंने पक्षियों के संरक्षण के लिए जो योगदान दिया है उसके लिए उन्हें जे. पाल गेटी वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन प्राइज मिला है|उन्हें कई राष्ट्रीय सम्मान और पुरस्कार भी मिल चुके हैं|
आश्चर्य की बात यह है कि सालिम अली के पास किसी विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं है| यद्यपि उन्होंने कालेज में प्रवेश लिया था मगर बीजगणित और लोगरिथम से डर कर पढ़ाई छोड़कर भाग खड़े हुए| वह अपने भाई की वुल्फ्रेम माइनिंग में मदद करने वर्मा चले गए लेकिन यहां भी यह असफल रहे| यह वर्मा के जंगलों में वुल्फ्रेम के बदले पक्षियों की खोज करने लगे|
घर लौटने पर उन्होंने प्राणी शास्त्र में एक कोर्स कर लिया और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के अजायबघर में गाइड नियुक्त हो गए| वह पक्षियों की चमड़ी उतारने और उन्हें भरने की उच्च प्रशिक्षण लेने के लिए जर्मनी गए| 1 वर्ष बाद लौटने पर उन्होंने पाया कि उनकी नौकरी चली गई है और वह बेकार हो गए हैं| पैसे की कमी के कारण उनकी अनुपस्थिति में उनका पद ही समाप्त कर दिया गया था|
सालिम अली विवाहित थे और काम की सख्त जरूरत थी| लेकिन उन्हें ज्यादा से ज्यादा क्लर्क का काम मिलने की उम्मीद थी और उसके बाद उन्हें अपने मनचाहे काम बर्डवाचिंग के लिए अधिक समय नहीं मिल सकता था|
सौभाग्य से उनकी पत्नी की कुछ निजी आय थी जिससे इन्हें बहुत सहारा मिला| उन्होंने बंदरगाह के पार किहिम में एक छोटा सा घर ले लिया|
यह घर पेड़ों के बीच बना हुआ था और वहां बड़ी शांति थी| जब वर्षा ऋतु आई तो सालिम अली ने देखा कि घर के पास ही बयां पक्षियों ने एक पेड़ पर अपनी बस्ती बनाई है| तब तक बया पक्षी के बारे में लोगों को कुछ ज्यादा जानकारी नहीं थी| इन पक्षियों का अध्ययन करने का सालिम अली के लिए यह सुनहरा अवसर था| तीन चार महीने तक वह रोज घंटों बैठे बड़े धैर्य से इन पक्षियों को वहां कार्यरत देखते रहे| सन् 1930 में इस अध्ययन के परिणाम को प्रकाशित किया तो उन्हें पक्षी विज्ञान (ओर्निथोलॉजी) में खूब ख्याति मिली|
जो महीने उन्होंने बया पक्षियों का अध्ययन करते हुए बिताए थे उससे उन्हें स्वयं परीक्षण और प्रेक्षण का महत्व समझ में आया|और यह भी जान गए कि आंखें बंद करके किसी की बात को चाहे वह कितनी भी प्रसिद्ध व्यक्ति ने क्यों ना कही हो स्वीकार नहीं करना चाहिए| वह अपने पर्यवेक्षण के परिणामों को बार बार जांचते थे और जल्दी किसी परिणाम पर नहीं पहुंचते थे| इससे इनके विचारों और राय को अधिकारिक माना जाने लगा है, और इसी कारण कई बार उनका टकराव वरिष्ठ पक्षी प्रेमियों से हुआ|
इसका प्रसिद्ध उदाहरण है रैकेट टेल्ड ड्रॉन्गो में दुम के परो का निकलना| एक प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी ने कहा कि सालिम अली का परीक्षण गलत है, लेकिन फिर अंततः सालिम अली ही ठीक निकले| उनकी फिन बयां की खोज भी महत्वपूर्ण योगदान है |समझा जाता था कि 100 वर्ष से वह पक्षी विलुप्त हो गया है मगर सालिम अली ने कुमायूं की पहाड़ियों में उसे खोज निकाला|
अपने बचपन में सालिम अली को भारतीय पक्षियों पर एक अच्छी पुस्तक की कमी बहुत खलती थी| जो कुछ पुस्तकें उपलब्ध थी उनमें चित्र ही नहीं थे और इनमें केवल उकता देने वाला विस्तृत वर्णन था| ऐसी पुस्तकें किसी का पक्षियों के प्रति उत्साह बढ़ाने के स्थान पर उसे बिल्कुल खत्म कर देती हैं, विशेषकर बच्चों में| सन 1941 में उन्होंने यह कमी पूरी करने की कोशिश की और बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स लिखी| उसमें सुंदर वर्णन भी था और प्रत्येक जाति का सुंदर चित्र भी | किसी अजनबी के लिए भी उसे देखकर पक्षी पहचानना आसान हो गया| सन 1948 में उन्होंने प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी एस. डिलन रीप्ले के साथ एक अन्य महत्वाकांक्षी योजना पर काम आरंभ किया| दोनों ने 10 खंडों में एक पुस्तक लिखी "हैंडबुक ऑफ़ द बर्ड्स ऑफ़ इंडिया एंड पाकिस्तान"| इस पुस्तक में इस उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले सभी पक्षियों के बारे में जानकारी है| उनकी आकृति, वे कहाँ मिलते हैं, उनकी प्रजनन की आदतें, प्रवजन (माइग्रेशन) और यह भी कि उनके बारे में और क्या जानना बाकी है|
सालिम अली बर्ड वाचिंग के लिए सारे देश में घूमे हैं| कहा जाता है कि देश का ऐसा कोई कोना नहीं जहां उन्होंने अपने रबर के भारी जूतों के चिन्ह ना छोड़े हैं|
सन 1987 में सालिम अली की मृत्यु हो गई| इन्हें "बर्ड मैन ऑफ इंडिया" कहा जाता है|
शुक्रवार, 10 जुलाई 2020
के. एस. कृष्णन
सन 1955 में यू.एस. नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज ने के.एस. कृष्णन को अतिथि भाषणकर्ता के तौर पर अपने वार्षिक रात्रि भोज में निमंत्रित किया- यह किसी भी वैज्ञानिक के लिए बहुत सम्मान की बात है| और कृष्णन ने सबकी आशा से अधिक सफलता पाई| उन्होंने बताया कि विज्ञान और तकनीकी के माध्यम से भारत अपनी संस्कृति में क्या-क्या परिवर्तन करेगा| भारतीय संस्कृति, धर्म ,दर्शन और विज्ञान के अनेक विषयों के गहरे ज्ञान से उन्होंने अमेरिका के विख्यात वैज्ञानिकों को सम्मोहित सा कर लिया |
बाद में एक प्रमुख भौतिक शास्त्री ने टिप्पणी की, " कृष्णन ने ए. एम. वाइटहेड (विख्यात अंग्रेज गणितज्ञ और दार्शनिक )से बहुत उद्धृत किया था और उसके भाषण नहीं मुझे वाइटहेड की पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित किया|" कृष्णन केवल वैज्ञानिक ही नहीं थे, वह भौतिक शास्त्री एवं दार्शनिक थे| उन्हें संस्कृत, अंग्रेजी और तमिल साहित्य का भी उतना ही ज्ञान था जितना भौतिकी का |
करियामणिक्कम श्रीनिवास कृष्णन का जन्म 4 दिसंबर सन 1898 में तमिलनाडु में हुआ था |उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मद्रास में प्राप्त की|फिर वह सन 1920 में शोध कार्य करने के लिए कोलकाता चले गए| यहां पर उन्होंने ऑप्टिक्स के क्षेत्र में सी .वी. रमन के नेतृत्व में अनुसंधान करने के लिए इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन साइंस में प्रवेश लिया| कहा जाता है कि रमन इफेक्ट की खोज में उनका भी योगदान था सन 1948 में दिल्ली की राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला के प्रथम निदेशक बने|
कृष्णन सदा अपने छात्रों से कहते थे "भौतिकी का अर्थ है तथ्यों का सामना करना|" भौतिकी में में उनका योगदान विविध क्षेत्रों में है| क्रिस्टल में मौजूद सुंदर संयोजन सपने देखे होंगे| यह पैटर्न या मॉलिक्यूल की उपलब्धता के कारण बनते हैं| विविध संगठनों से अलग अलग पैटर्न बनते हैं|सॉलिड स्टेट भौतिकी किसी ठोस पदार्थ में ऐसे संयोजन एवं उनसे होने वाली क्रियाओं का अध्ययन है| कृष्णन ने ठोस पदार्थों में अणु की सुंदरता का तथा उन शक्तियों का अध्ययन किया जो ऑडियो या परमाणु को इस तरह व्यवस्थित रखती है|
उन्होंने इस बात का भी अध्ययन किया कि ठोस पदार्थ के विविध रूपों जैसे छड़ या कॉल जब वैक्यूम में गर्म किए जाते हैं तो ऊष्मा उनमें कैसे वितरित होती है| इसका औद्योगिक उत्पादन में काफी उपयोग है |थर्मोनिक्स ( तापायनिक)- किसी गर्म पदार्थ से निकलने वाले इलेक्ट्रॉन के व्यवहार और नियंत्रण प्रक्रिया का अध्ययन- इस क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान है |
कृष्णन को बहुत बार सम्मानित किया गया और सन 1940 में रॉयल सोसाइटी का सदस्य चुना गया| उनकी मृत्यु सन 1961 में हुई |
सोमवार, 6 जुलाई 2020
मेघनाद साहा
मेघनाद साहा का जन्म 6 अक्टूबर सन 1893 में ढाका जिले के सियोरातली गांव में हुआ था जो आजकल बांग्लादेश में है| उनके पिता परचून की दुकान करते थे जिससे बड़े परिवार का कठिनता से पालन पोषण होता था |वह अपने पांचवे बच्चे मेघनाद से आशा करते थे कि वह बचपन में ही परिवार के लिए कमाने लगेगा |अध्यापकों के कहने पर पिता ने अपने होनहार बेटे मेघनाद को 11 किलोमीटर दूर एक स्कूल के छात्रावास में अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए भेज दिया|अध्यापकों के अनुसार वह अत्यंत प्रतिभाशाली छात्र था |उनके छात्रावास का खर्चा कोई शुभ आकांक्षी दे रहा था| जब शाह ने छात्रवृत्ति प्राप्त कर ली तो उन्हें उच्च शिक्षा के लिए ढाका भेज दिया गया |बायकाट के पश्चात उन्हें दूसरे स्कूल में प्रवेश लेना पड़ा |फिर भी वार्षिक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया| इससे उन्हें फिर छात्रवृत्ति मिली और उन्होंने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश किया| यहां पर उन्हें पढ़ाने वाले अध्यापक जे. सी .बोस और पी.सी. रे जैसे सुप्रसिद्ध व्यक्ति थे| उनके साथी भी प्रतिभाशाली एस.एन.बोस और पी.सी.महालनोविस थे जो इन्हीं की तरह प्रसिद्ध वैज्ञानिक बने |
एम. एससी . मैं मेघनाद साहा को द्वितीय स्थान मिला |प्रथम स्थान एस.एन.बोस को मिला था| उन्होंने इंडियन फाइनेंस सर्विस में जाने का निश्चय किया जिससे अपने जरूरतमंद परिवार की मदद कर सकें |वैज्ञानिक संसार के सौभाग्य से, उनका स्कूल का बहिष्कार और देशभक्त सुभाष चंद्र बोस और राजेंद्र प्रसाद जैसे व्यक्तियों से संबंध के कारण उन्हें कोई भी सरकारी नौकरी ना मिली | स्वाभाविक था कि वह भौतिकी और गणित में शोध कार्य करने की ओर मुड़े |
वह अपनी जीविका बच्चों को ट्यूशन देकर कमाने लगे अपने छात्रों को पढ़ाने के लिए वह साइकिल पर प्रातः और सायं दूर-दूर तक जाते थे |सन 1917 में वह और एस.एन. बोस यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ साइंस जो नया खुला था में प्राध्यापक नियुक्त किए गए |भौतिकी में उन दिनों ऊष्मागतिकी, सापेक्षतावाद और परमाणु सिद्धांत सबसे नई चीजें थी| शाह ने इन विषयों पर खूब पुस्तकें पढ़ें और उन्हें बहुत अच्छी तरह पढ़ाया भी| पढ़ाने के लिए नोट्स बनाते हुए उनके सामने एस्ट्रोफिजिक्स की एक समस्या आई| इस समस्या के हल से वह पूरे संसार में प्रसिद्ध हो गए|
भौतिकी में हुई नवीनतम प्रगति के जानकार साहा ने आयोनाइजेशन फार्मूला सामने रखा जिससे वर्णक्रम रेखाओं की उपस्थिति समझाई जा सकती थी| इस फार्मूले द्वारा खगोलज्ञ को सूर्य और दूसरे सितारों का तापमान ,दबाव और इनकी भीतरी संरचना का पता लग जाता है|
तारा भौतिकी के क्षेत्र में या एकदम नई खोज थी |साहा ने जब यह फार्मूला लोगों के सामने रखा उस समय उनकी आयु करीब 25 वर्ष की थी |वैज्ञानिक जगत ने उनके कार्य की प्रशंसा की |एक प्रसिद्ध खगोलज्ञ ने तो यहां तक कहा कि या तारा भौतिकी में 12वीं मुख्य खोज है |
अपनी खोज के करीब 10 वर्ष बाद सन 1927 में यह रॉयल सोसाइटी के सदस्य चुने गए |तब तक देश में उनके और उनके काम के बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते थे |कुछ वैज्ञानिकों ने उनके फार्मूले को झूठा तक कह डाला |उन वैज्ञानिकों ने बड़ा प्रयत्न किया कि वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में शामिल ना हो लेकिन साहा ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें कोई नहीं जीत सकता था| लोग उन्हें एयनशाफटन कहते थे |यह नाम उन्हें अपने काम में लगे रहने की दृढ़ता के कारण मिला था |उन्होंने कभी परवाह नहीं की कि अन्य लोग उनके बारे में क्या कहते हैं |वह इलाहाबाद में अध्ययन और शोध कार्य में लगे रहे| यहां वह स्पेक्ट्रोस्कोपी में शोध कार्य करने लगे| यह वर्णक्रम और आयन मंडल का अध्ययन है और इससे उनकी विभाग को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली|
प्राचीन भारतीय इतिहास, भूविज्ञान, पुरातत्व ने भी इन्हें अपनी और आकर्षित किया| उन्होंने शक युग के आरंभ के बारे में अध्ययन किया |कुछ चट्टानों की आयु मापी |बाद में जब वह कोलकाता आ गए तो उन्होंने सूर्य से आती रेडियो तरंगों और रेडियो एक्टिविटी के बारे में शोध कार्य किया|
जब ऑटोहोन , जिन्हें परमाणु बम का पिता कहा जा सकता है ने सन 1940 में अणु विखंडन तकनीक का पता लगाया तो साहा ने तत्काल इसके महत्व को समझ लिया|उनके कहने पर भारत में कोलकाता विश्वविद्यालय में न्यूक्लियर फिजिक्स का विषय पढ़ाया जाने लगा |सन 1948 में उन्होंने उस संस्था की नींव रखी है जिसे आज साहा इंस्टीट्यूट आफ न्यूक्लियर फिजिक्स कहा जाता है| उन्होंने विदेशों में साइक्लोट्रॉन को कार्य करते देखा था| उन्होंने इस यंत्र को इंस्टिट्यूट में भी लगवाया और सन 1950 में भारत का प्रथम साइक्लोट्रॉन काम करने लगा|
साहा एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थे| स्वयं गरीबी में पलें थे इसलिए वह अपने गरीब देशवासियों को नहीं भूले| जब भारत का विभाजन हुआ तो पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से जो शरणार्थी आए उन्हें बसाने में इन्होंने बड़ा काम किया |उन्हें वह समय भी भूला नहीं था जब बचपन में घर के निकट की नदी में बरसात में बाढ़ आ जाती तो वह राहत कार्य करते थे| उन्होंने बाढ़ के कारणों का अध्ययन किया और उन्हें नियंत्रित करने के लिए कई नदी घाटी परियोजनाओं के सुझाव दिए और इन से आरंभ हुए रिवर वैली प्रोजेक्ट जैसे दामोदर वैली, भाखड़ा नांगल और हीराकुंड यह परियोजना उस कार्य का परिणाम है जो उन्होंने प्रारंभ किया था|
साहा बड़े साफ दिल के और निडर व्यक्ति थे| कभी-कभी उन्होंने सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की |उन्हें औद्योगिकरण में पूरा विश्वास था और वह वापस गांव चलो नारे के विरूद्ध थे| उनका कहना था कि इससे गरीबी बीमारी अज्ञानता की समस्या हल नहीं होगी| उन्होंने एक पत्रिका साइंस और कल्चर के नाम से निकाली जिससे वह अपना दृष्टिकोण जनता के सामने रख सकें|
सन 1952 में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में संसद के लिए चुनाव लड़े और ढेर सारी वोटों से विजय प्राप्त की |
उनकी मृत्यु 16 फरवरी सन 1956 में हुई|
रविवार, 28 जून 2020
हरगोबिंद खुराना
भारत एक ऐसा देश है जहाँ कि धरती से अनेकों वैज्ञानिक समय समय पर पैदा हुए और भारत कि शान को पुरे विश्व में बढ़ा कर भारत का नाम रौशन किया |
ऐसे ही एक वैज्ञानिक थे - हरगोबिंद खुराना|
हरगोबिंद खुराना का जन्म भारत में हुआ | माना जाता है उनका जन्म 9 फरवरी 1922 में हुआ , उनकी वास्तविक जन्मतिथि का पता नहीं है | उनके पिता रायपुर ( अब पाकिस्तान ) गाँव के टैक्स कलक्टर थे | उस नन्हे से गाँव में, जहाँ करीब सौ लोग रहते थे, केवल उनका परिवार ही पढ़ा - लिखा था |
बालक हरगोबिंद खुराना ने पहला पाठ गाँव के अध्यापक से एक बड़े पेड़ कि छाया में बैठ कर पढ़ा | उन्होंने रसायन शास्त्र में बी .एससी. और एम.एससी. की डिग्री लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय से ली | वह सन 1945 में भारत सरकार की छात्रवृत्ति पर लिवरपूल विश्वविद्यालय में पी .एच. डी. करने के लिए गए | कार्बनिक रसायन शास्त्र में पी .एच. डी. करने के बाद जब वह देश में वापस आये तो उन्हें उपयुक्त काम नहीं मिला | जब अध्यापक के पद के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में दिया प्रार्थना पत्र भी अस्वीकार हो गया तो उन्होंने विदेश जाने का निश्चय किया |
हरगोबिंद खुराना ने सन 1959 में एक रसायन ' को एंजाइम ए 'का उत्पादन करके ख्याति पाई | यह रसायन मनुष्य के शरीर की कुछ प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य है| उस समय वह कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में कार्यरत थे | वहाँ से वह यू. एस. ए. में विस्कांसिन विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ़ एंजाइम रिसर्च में आये | सन 1970 में वह मेसाच्यूट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में जीव विज्ञान एवं रसायन के प्रोफेसर बने |
46 वर्ष की उम्र में खुराना ने मार्शल डब्ल्यू .निरेनबर्ग और रोबर्ट डब्ल्यू .हॉली के साथ 1968 में सम्मिलित रूप से चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया |तीनों ने अलग अलग काम करके जेनेटिक कोड को समझने में योगदान दिया था |
एशरिकिआ कोली ऐसा जीवाणु है जो मनुष्यों और जानवरों की अंतड़ियों में रहता है | कैम्ब्रिज ,ब्रिटेन में वैज्ञानिकों की टीम ने पहले ही इसकी संरचना का पता लगा लिया था | खुराना और उनकी टीम ने इस जीवाणु का जीन प्रयोगशाला में बनाने का निश्चय किया | धीरे धीरे उन्होंने एशरिकिआ कोली के 207 जीन बना डाले | इसका चरमोत्कर्ष अगस्त 1976 में हुआ जब इस मनुष्यकृत जीन को एशरिकिआ कोली में डाला गया और वह प्राकृतिक जीन कई तरह काम करने लगा |
इस उपलब्धि को संसार भर में आधुनिक जीव विज्ञान की एक महत्वपूर्ण सफलता मान कर सराहा गया |
एशरिकिआ कोली के एक जीन का उत्पादन करने में खुराना और उनके साथियों को 9 वर्ष का अथक श्रम करना पड़ा था |मनुष्य का जीन बनाने की सम्भावना अभी दूर है परन्तु शायद सपना नहीं है |अब धीरे धीरे मनुष्य का जीन बनाने पर भी काम शुरू हो गया है |
हरगोबिंद खुराना की मृत्यु 9 नवंबर सन 2011 को 89 वर्ष कई अवस्था में मेसाच्यूट्स यू .एस .में हो गयीं |
सम्मान -
(1)गैर्डनर फॉउंडेशन इंटरनेशनल अवार्ड
(2)लुईसा फॉउंडेशन इंटरनेशनल अवार्ड
(3) बेसिक मेडिकल रिसर्च के लिए एल्बर्ट लॉस्कर पुरस्कार
(4) पद्म विभूषण
(5) 1968 में चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार
शुक्रवार, 19 जून 2020
पंचानन माहेश्वरी
भारत में सदियों से बड़े बड़े वैज्ञानिको ने जन्म लेकर भारत का नाम ऊँचा किया | उन्ही वैज्ञानिकों में से एक नाम है - पंचानन माहेश्वरी|
पंचानन माहेश्वरी का जन्म 9 नवंबर सन 1904 में जयपुर राजस्थान में हुआ |उनके पिता लिपिक थे मगर उनकी इच्छा थी कि अपने बेटे को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाएं | उनके पिता ने उन्हें जीवन अनुशासित तरीके से बिताने कि शिक्षा दी | वह स्वयं देर तक काम करते जिससे पंचानन माहेश्वरी के लिए तरह तरह कि किताबें खरीद सकें | उनके घर में सदा एक छोटी सी प्रयोगशाला रही जिसमे वह अपने शोध कार्य करते थे |
इलाहबाद विश्वविद्यालय के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में जुलाई सन 1921 में बी.एस सी. में इन्होने प्रवेश लिया | उस समय विश्वविद्यालय में विनफिल्ड नामक अमेरिकन मिशनरी व विख्यात वनस्पति शास्त्री, विभाग के अध्यक्ष व भारतीय वनस्पति शास्त्र सोसायटी के संस्थापक भी थे | यद्यपि छात्र उन्हें सम्मान देते थे मगर कठोर होने के नाते उनसे डरते भी थे | उन्हें प्रसन्न करना कठिन था | लेकिन पंचानन माहेश्वरी में उन्हें वह छात्र मिला जिसकी उन्हें अब तक खोज थी |
विनफिल्ड पौधों की किस्मे एकत्र करने के लिए पंचानन माहेश्वरी को अभियानों पर लें जाते और यात्रा के दौरान उन्हें प्लांट मॉर्फोलॉजी के मूल सिद्धांत समझाते |
एम. एस सी. करने के बाद पंचानन माहेश्वरी ने विनफिल्ड के मार्गदर्शन में शोध कार्य आरम्भ किया | उन्होंने एंजियोस्पर्म का आकृति विज्ञान, एनाटमी और भ्रूण विज्ञान का अध्ययन किया |
पंचानन माहेश्वरी ने एंजियोस्पर्म की कई जातियों में बढ़ने की प्रक्रिया का अध्ययन किया | उन्होंने भ्रूण सम्बन्धी अध्ययन परीक्षण के दौरान पाई जाने वाली भिन्नता के आधार पर इन पौधों का वर्गीकरण भी किया|
सन 1931 में माहेश्वरी ने डी .एस सी. को डिग्री भी प्राप्त कर ली |इलाहबाद विश्वविद्यालय छोड़ने से पहले वह विनफिल्ड की अपना आभार प्रकट करने के लिए मिले|
पंचानन माहेश्वरी लगातार अथक परिश्रम करते रहे | बीरबल साहनी मेडल मिलने के साथ साथ उन्हें सुंदरलाल होरा मेमोरियल मेडल भी मिला और सन 1965 में रॉयल सोसायटी के सदस्य चुने गए |
सन 1949 में पंचानन माहेश्वरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्र विभाग का अध्यक्ष बनने का निमंत्रण मिला | वह इस बात पर दृढ प्रतिज्ञ थे कि अपने छात्रों को भ्रूण विज्ञान में दिलचस्पी लेने के लिए तैयार करेंगे | यह उनका स्वयं का शोध क्षेत्र था | उस समय यह विषय थोड़ा उपेक्षित था|¢उन्होंने इस क्षेत्र में शोधकार्य करने का निश्चय किया मगर महंगे उपकरण का उपयोग नहीं किया |उनके प्रयास को सफलता मिली|वनस्पति शास्त्र विभाग कि प्रगति ही नहीं हुई बल्कि विदेश में भी उसका नाम हो गया | और स्थानों के वैज्ञानिक भी इस क्षेत्र में शोधकार्य करने लगे | पंचानन माहेश्वरी को आधुनिक भ्रूण विज्ञान का प्रवर्तक कहा जा सकता है |
उन्हीने ही एंजियोस्पर्म पौधों में टेस्ट ट्यूब तकनीक कि प्रक्रिया का आविष्कार किया |तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि फूल वाले पौधों का निषेचन टेस्ट ट्यूब में भी हो सकता है |
माहेश्वरी ने दो प्रामाणिक पुस्तकें एन इंट्रोडक्शन टू दी एम्ब्र्योलॉजी ऑफ़ एंजियोस्पर्म और रिसेंट एडवांसेज इन एम्ब्र्योलॉजी ऑफ़ एंजियोस्पर्म लिखी है |
सन 1951 में उन्होंने इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ़ प्लांट मॉर्फोलॉजिस्ट्स नामक संस्था कि स्थापना की | 18 मई सन 1966 में जब उनका देहांत हुआ तब तक वह फायटो मॉर्फोलॉजी नामक पत्रिका का संपादन करते रहे |
शुक्रवार, 12 जून 2020
सत्येंद्र नाथ बोस
भारत में एक से बढ़ कर एक अनेक वैज्ञानिको ने समय समय पर दुनिया में अपना परचम फहराया , और भारत की छवि को विश्व में ऊपर उठाने का काम किया है | ऐसे ही एक भारतीय वैज्ञानिक थे एस .एन .बोस |
जब शिक्षा शास्त्री आशुतोष मुखर्जी ने कलकत्ता में यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ साइंस की स्थापना की तो कॉलेज में ढंग का पुस्तकालय नहीं था | सन 1916 में जब दो प्रतिभाशाली युवकों ने कॉलेज में प्राध्यापक पद संभाला तो उनका लक्ष्य था भौतिकी और गणित में शोध कार्य | लेकिन पुस्तकालय की दशा देखकर उन्हें बड़ी निराशा हुई |
यह उन दिनों की बात है जब भौतिकी में एक क्रांति हो रही थी और आधुनिक भौतिक शास्त्र अपना आकार लें रहा था | जर्मन भौतिक शास्त्री मैक्स प्लान्क ने क्वांटम थ्योरी पेश की थी | अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने आपेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत किया था | इसके अतिरिक्त परमाणु की आंतरिक संरचना को समझने में भी बहुत प्रगति हो रही थी | यद्यपि अन्य प्राध्यापक पुराना भौतिक शास्त्र ही पढ़ा कर संतुष्ट थे मगर ये दोनों युवक जानना चाहते थे कि अब आधुनिक भौतिक शास्त्र में कितनी प्रगति हुई है |
यह जरा कठिन था | प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था, इस कारण नवीनतम पुस्तकें और पत्रिकाएं भारत में नहीं पहुँच रही थी | निराश होकर दोनों ने पुस्तकें ढूढ़नी शुरू कर दी | एक जर्मन वैज्ञानिक पी .जे. ब्रुहल जो उस समय देश में ही रह रहे थे, के पास आधुनिक भौतिक शास्त्र पर कुछ पुस्तकें और लेख थे | किन्तु ये सब जर्मन भाषा में थे |
दोनों वैज्ञानिक अपनी खोज में लगे रहे |उन्होंने जर्मन भाषा सीखी | कुछ समय बाद अध्यापक और उनके शिष्य उन्हें आधुनिक भौतिकी कि नई खोज पर विवेचना करते हुए देखने लगे |
सन 1920 में उन्होंने अल्बर्ट आइन्स्टाइन के आपेक्षता के सिद्धांत सम्बन्धी शोधपत्रों का जर्मन भाषा से अंग्रेजी में अनुवाद किया |
ये दो युवक और कोई नहीं, सत्येंद्र नाथ बोस और मेघनाद साहा थे | कुछ समय तक उन्होंने साथ साथ शोधकार्य किया फिर साहा विदेश चले गए और बोस ढाका यूनिवर्सिटी में कार्य करने लगे |
बोस के जीवन में यह एक नया मोड़ था | इनका एक मित्र जो अभी अभी विदेश से लौटा था उसने इन्हे मैक्स प्लान्क कि प्रसिद्ध पुस्तक "थर्मोडायनमिक्स एंड हीट" उपहार के तौर पर दी | इस पुस्तक में प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री के मूल लेख थे | बोस ने उसे पढ़ने के बाद स्वयं ही इक्वेशन और फॉर्मूले हल कर लिए |
फिर भी वह एक स्थान पर अटक गए | प्लान्क ने एक स्थान पर परिकल्पना से एक इक्वेशन कि अनुमानित गणना कर लीं थी |" किसी विचार को तब तक स्वीकार नहीं करना चाहिए जब तक तुम स्वयं उससे संतुष्ट नहीं होते " यह बोस का आदर्श था | इसलिए उन्होंने इस पर काम करना शुरू किया और इस दौरान थ्योरेटिकल या मैथमेटिकल फिज़िक्स के विकास में कीर्तिमान स्थापित कर दिए | उस समय बोस कि आयु करीब 30 वर्ष कि होगी |
बोस ने 4 पन्ने का अपना शोध लेख " प्लांक्स लॉ एंड लाइट क्वांटम हाइपोथिसिस " एक भारतीय पत्रिका के पास भेजा और फिर कई विदेशी पत्रिकाओं को | सबने उसे अस्वीकार कर दिया |
सन 1924 में हताश होकर बोस ने अपना लेख अल्बर्ट आइन्स्टाइन को भेजा | बोस ने अपने उस लेख में एक दुस्साहसी विचार रखा था जिसने अल्बर्ट आइन्स्टाइन को बहुत प्रभावित किया | यहाँ तक कि अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने उस पेपर का स्वयं जर्मन में अनुवाद किया और एक पत्रिका में प्रकाशित करवाया |
बोस के पेपर ने एक नए प्रकार की सांख्यिकी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |
विकिरण के व्यवहार को समझाने के लिए उन्होंने जो सांख्यिकी हल की उसे बोस स्टेटिस्टिक्स कहते हैं | मूल तत्व के कण जैसे फोटोन्स और अल्फा कण जो बोस सांख्यिकी के सिद्धांत को मानते हैं उन्हें बोसोन्स कहा जाता है | इस प्रकार उनका नाम विज्ञान का एक भाग बन गया |
बोस का जन्म 1 जनवरी सन 1894 में हुआ था | जब वह स्कूल में ही थे तो लोग समझने लगे थे कि वह पियरे साइमन लैपलेस और ऑगस्टिन लुई काउची जैसा प्रसिद्ध गणितज्ञ बनेगा | प्रश्नों को हल करने कि उसकी प्रतिभा उसके अध्यापकों को इतना प्रभावित करती थी कि वह उसे 100 में से 110 अंक दें दिया करते थे | उनकी महत्वपूर्ण खोज के 34 वर्ष बाद अपने जीवन के अंत में उन्हें रॉयल सोसायटी का सदस्य चुना गया |
बोस ने भौतिकी को अन्य शाखाओं में जैसे एक्स - रे क्रिस्टलोग्राफी और उष्मागतिकी पर भी प्रयोग किये | उन्होंने एक रासायनिक यौगिक भी बनाया जो आज तक आँखों में दवाई के तौर पर डाला जाता है|
कलकत्ते में उनकी खोज बोस स्टेटिस्टिक्स कि स्वर्ण जयंती के सम्मान में एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार हुआ | उस अवसर पर बोस ने कहा कि अब उन्हें और जीने कि इच्छा नहीं है क्योंकि उनकी खोज को पुरे संसार में मान्यता मिल गयीं है | एक महीने बाद 4 फरवरी सन 1974 को उनका देहांत हो गया | उनकी मेज पर एक आधी हल की हुई समस्या पड़ी थी | यह समस्या संख्या सिद्धांत से सम्बंधित थी |
शुक्रवार, 5 जून 2020
बीरबल साहनी
सन 1932 में एक विदेशी वैज्ञानिक लखनऊ विश्वविद्यालय में बीरबल साहनी से मिलने आया | वह भारत के एक महान पेलियोबॉटनिस्ट (जीवाश्म वनस्पति विज्ञानी) थे | उन्हें छोटे वनस्पति संग्रहालय के एक कोने में बैठा देखकर वह विस्मित सा रह गया | " हैल्लो प्रोफेसर साहनी , " वह उनसे हाथ मिलाता हुआ बोला, " आपके पास बैठने का स्वयं का कमरा तक नहीं है | "
" महान वैज्ञानिको ने दुछत्तियो तक में बैठकर काम किया है, " साहनी साहब ने उत्तर दिया|
पिछले युग कि वनस्पतियों का अध्धयन इस देश के लिए एक नया विज्ञान था| इसे जीवाश्म वनस्पति विज्ञान (पेलियोबॉटनी ) कहते हैं | ऐसे उपकरण उपलब्ध नहीं थे जिससे चट्टान को काटा या पीसा जा सके | और उनमें अंकित लुप्त वनस्पति जीवाश्मों का अध्धयन किया जा सके | साहनी अपना बहुत सा समय स्वयं अपने कुशल हाथों से यह काम करते हुए बिताते | वह अपने पैसे से ही नए उपकरण भी खरीदते | वास्तव में जीवाश्म वनस्पति विज्ञान के अध्धयन को समर्पित एक संस्थान का निर्माण उनकी महत्वाकांक्षा थी |
अध्यापक होने के नाते साहनी ने पहले वनस्पति विज्ञान विभाग में पढ़ाने का स्तर ऊंचा किया | इसके बाद उन्होंने भूविज्ञान विभाग कि स्थापना की | उनके सपनों की संस्था इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेलियोबॉटनी की स्थापना उसके बाद हुई | यह दुनिया में अपने तरह की पहली संस्था थी | सन 1941 में जब श्री जवाहर लाल नेहरू ने इस संस्था की इमारत की आधारशिला रखी तो उसके एक सप्ताह बाद ही साहनी जी का स्वर्गवास हो गया | उनके अधूरे कार्य को उनकी पत्नी ने पूरा किया | आज यह संस्था बीरबल साहनी
इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेलियोबॉटनी के नाम से प्रसिद्ध है |
साहनी का जन्म 14 नवंबर सन 1891 में पंजाब के भेरा नामक नगर में हुआ जो अब पाकिस्तान में है | उनके पिता रसायन विज्ञान के अध्यापक थे जिन्हे प्रकृति अध्ययन में बड़ी दिलचस्पी थी | गर्मी की छुट्टियों में पिता अपने पुत्र को पहाड़ो में घुमाने ले जाते थे | वे साथ साथ चट्टानों के टुकड़े पौधे और जीवाश्म वाली चट्टानें इकट्ठा करते| युवा साहनी वनस्पति और भूविज्ञान में इतनी रूचि लेने लगे कि उन्होंने अपने पिता कि इच्छा के विरुद्ध इन्हे अपनी जीविका का साधन भी बना लिया | उनके पिता चाहते थे कि वह इंडियन सिविल सर्विस में प्रवेश लें |
सन 1911 में पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से बी . ए. पास करके वह ब्रिटेन चले गए | सन 1919 में उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय से डी. एससी. की डिग्री प्राप्त की | इसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक ऐ .सी. स्टुअर्ड के निर्देशन में फ़र्न, कोनिफर्स और जीवाश्म पौधों पर शोध कार्य किया | वह प्रथम भारतीय थे जिन्हे सन 1929 में कैंब्रिज से डी. एससी की डिग्री मिली | सन 1936 में वह रॉयल सोसायटी के सदस्य चुने गए |
वह प्रथम वनस्पति वैज्ञानिक थे जिन्होंने इंडियन गोंडवाना के पेड़ पौधों का विस्तार से अध्ययन किया | उन्होंने बिहार की राजमहल पहाड़ियों की भी खोजबीन की | वहाँ उन्होंने पौधों के कुछ नए जीन्स की खोज की | उनके कुछ आविष्कारों ने प्राचीन पौधों और आधुनिक पौधों के बीच विकासक्रम के सम्बन्ध को समझने में मदद की |
उन्होंने एक नए समूह के जीवाश्म पौधों की खोज की | ये जिम्नोस्पर्म हैं | चीड़ तथा उनकी जाति के दूसरे पेड़ जिन्हे पेंटोजाइलीज कहते हैं |
साहनी एक भू विज्ञानी भी थे | इसके अतिरिक्त साहनी की पुरातत्व विज्ञान में भी बड़ी रूचि थी | उनकी एक खोज यात्रा में उन्हें सन 1936 में रोहतक में सिक्के बनाने के सांचे मिले थे | प्राचीन भारत में सिक्के ढालने के तरीको के अध्ययन और खोज पर उन्हें न्यू मिस्मैटिक सोसायटी ऑफ़ इंडिया la नेलसन राइट मेडल भी मिला | वह चित्रकला और क्ले मॉडलिंग में भी बहुत दक्ष थे | उनके पास डाक टिकटों और सिक्कों का भी एक बहुत बड़ा संग्रह था |
बुधवार, 27 मई 2020
विक्रम ए. साराभाई
1943 में विक्रम साराभाई जो उस समय केवल 23 वर्ष के थे ऊचाई पर अंतरिक्ष किरणों का अध्ययन करने के लिए कश्मीर में हिमालय पर पहुंचे | उन्हें वह स्थान इतना अच्छा लगा कि उन्होंने वहाँ अंतरिक्ष किरणों का अध्ययन करने के लिए प्रयोगशाला खोलने का निश्चय किया |
ब्रिटेन से पी .एच. डी. करके लौटने पर उन्होंने भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला कि नींव अहमदाबाद में रखी | यह संस्था अंतरिक्ष किरणों और बाह्य अंतरिक्ष को समर्पित है | सन 1955 में उन्होंने प्रयोगशाला कि शाखा कश्मीर के गुलमर्ग नामक स्थान में स्थापित की | इसी तरह अन्य केंद्र तिरुअनंतपुरम और कोडाईकनाल में स्थापित की |
साराभाई का जन्म 12 अगस्त सन 1919 में हुआ था और उनका जीवन भी भाभा से बहुत मिलता -जुलता था | उनका परिवार भी धनी था | यदि वह चाहते तो उद्योगपति बन सकते थे | लेकिन उनकी मूल रूचि गणित और भौतिकी में थी | भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला का उद्देश्य वहीं था जो भाभा की संस्था टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च का है | यह संस्था देश को अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए वैज्ञानिक और तकनीक उपलब्ध कराती है |
वास्तव में साराभाई भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ( इसरो ) का विस्तार करके देश को अंतरिक्ष युग में ले गए | आज अंतरिक्ष तकनीक में भारत की जो उपलब्धियां है उसका श्रेय साराभाई को ही है|यद्द्पि अपने परिश्रम का परिणाम देखने के लिए वह जीवित नहीं रहे | उनके द्वारा शुरू की गयीं योजनाओं में एक वह भी थी जिसके अंतर्गत सन 1975 में आर्यभट्ट उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा गया था | सन 1975 - 76 में सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविज़न एक्सपेरिमेंट (साइट ) कार्यक्रम जिसका लक्ष्य 2400 भारतीय गांवों में रहने वाले 50 लाख लोगो तक शिक्षा पहुंचना था , का श्रेय भी उन्ही को जाता है |
एक दृष्टि में साराभाई भाभा से भी एक कदम आगे थे | उन्होंने विभिन्न प्रकार के प्रतिष्ठानों की स्थापना की |
भाभा की तरह उनकी मृत्यु जल्दी हो गयीं , जब वह केवल 52 वर्ष के थे | विज्ञान और समाज की सेवा के लिए उन्हें कई तरह से सम्मानित किया गया एवं अवार्ड भी मिले | अंतराष्ट्रीय एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने चन्द्रमा के सी ऑफ़ सिरिनिटी क्षेत्र में एक क्रेटर का नाम इनके नाम पर रखकर उन्हें सम्मानित किया |
मंगलवार, 26 मई 2020
चंद्रशेखर वेंकट रमण (सी. वी. रमण )
कलकत्ते के व्यस्त बहू बाजार में 210 नंबर पर एक पुरानी इमारत है | देश में यह वैज्ञानिक संस्था का मुख्यालय था | इस संस्था का नाम है इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस | सन 1927 में दिसंबर की एक साँझ को उसकी एक प्रयोगशाला में बड़ी उत्तेजना का वातावरण था | चंद्रशेखर वेंकट रमण एक मेहमान की प्रयोगशाला के उपकरण दिखा रहे थे तभी एक चश्माधारी युवक के. एस. कृष्णन लपक कर भीतर आया और बोला," प्रोफेसर कॉम्प्टन को नोबेल पुरस्कार मिला है |''
यह सुनकर रमण बहुत प्रसन्न हुए ," बहुत अच्छी खबर लाये हो , '' उन्होंने खुश होकर कहा | वह फिर विचारों में खो गए |
" लेकिन कृष्णन एक बात है, यदि एक्स - रे के बारे में कॉम्प्टन इफ़ेक्ट सही है तो प्रकाश के लिए भी उसे सही होना चाहिए |''
कुछ वर्ष पूर्व ए. एच. कॉम्प्टन ने यह प्रमाणित किया था कि एक्स -रे कि प्रकृति किसी पदार्थ से गुजरते समय बदल जाती है | परिवर्तन पदार्थ के प्रकार पर निर्भर होता है | इसे कॉम्प्टन इफ़ेक्ट के नाम से जाना जाता है |
यदि प्रकाश पारदर्शी माध्यम से गुजरेगा तो क्या उसकी प्रकृति में भी बदलाव आ जायेगा ? रमण ने यही प्रश्न पूछा था | 5 वर्षो से वह प्रकाश विज्ञान (ऑप्टिक्स ) पर शोध कार्य कर रहे थे | उनकी प्रयोगशाला में बहुत विकसित किस्म के उपकरण भी नहीं थे | लेकिन रमण को अपने पर पूरा भरोसा था कि उपकरणों में कुछ बदलाव करके वह इस प्रश्न का उत्तर अवश्य खोज निकालेंगे |
4 महीने बाद ही 16 मार्च सन 1928 को उन्होंने अपनी खोज नए विकिरण (न्यू रेडिएशन )के बारे में बंगलुरु में उपस्थित विशिष्ट वैज्ञानिको को बताया | संसार में यह खोज रमण इफ़ेक्ट के नाम से प्रसिद्ध हुई | इस खोज पर ही उन्हें सन 1930 का नोबेल पुरस्कार. मिला था |
रमण का जन्म 7 नवंबर सन 1888 में तमिलनाडु के एक शहर त्रिचिरापल्ली में हुआ था | उनके पिता कॉलेज में भौतिकी के प्राध्यापक थे |जब रमण ने दसवीं पास कर लीं तब उनके माता पिता ने उच्च शिक्षा के लिए उन्हें विदेश भेजना चाहा | किन्तु एक ब्रिटिश सर्जन ने उन्हें इसके विरुद्ध सलाह दी | रमण देश में ही रहे और मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से उन्होंने एम. ए. कि डिग्री प्राप्त की |
विज्ञान ने उन्हें बहुत प्रभावित किया था और वह प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिकाओं में शोध लेख लिखने लगे | 19 वर्ष की आयु में ही वह इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस के सदस्य भी बन गए | अपने माता - पिता की इच्छा के अनुसार उन्होंने कलकत्ते में वित्त मंत्रालय में एक प्रशासनिक पद पर नियुक्ति ले लीं | परन्तु इससे विज्ञान ने उनकी दिलचस्पी कम नहीं हुई | ऑफिस से आने के बाद उनका सारा समय एसोसिएशन की प्रयोगशाला में व्यतीत होता |
विदेश की वापसी यात्रा के समय आकाश और जल के नीलेपन ने उनमे एक जिज्ञासा उत्पन्न कर दी | भला ये दोनों नील क्यों हैं ? जहाज के डेक पर बैठकर वह इस प्रश्न का हल खोजते रहे | और वह इस परिणाम पर पहुंचे कि नील रंग का कारण यह था कि पानी के अणु प्रकाश को छितरा देते हैं | कलकत्ते में अपनी प्रयोगशाला में लौटने पर वह इस विचार को प्रमाणित करने में लग गए | इस तरह से ऑप्टिक्स में उनका शोधकार्य आरम्भ हुआ, जिससे उनको इतनी ख्याति मिली |
सन 1924 में रॉयल सोसायटी ने रमण को प्रकाश विज्ञान में उनके योगदान के लिए अपना सदस्य बना लिया और 6वर्ष बाद प्रकाश विज्ञान (ऑप्टिक्स ) पर ही उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया और संसार में प्रसिद्धि मिली |
आखिर सन 1943 में बंगलुरु के निकट उन्होंने अपना संस्थान खोला - रमण इंस्टिट्यूट | यहाँ पर वह 20 नवंबर 1970 में अपनी मृत्यु तक बराबर कार्य करते रहे |
युवा वैज्ञानिको को उनकी सलाह थी कि चारो ओर देखो, अपने को अपनी प्रयोगशाला में बंद कर लो | " विज्ञान का सार उपकरण नहीं, बल्कि स्वतंत्र सोच विचार और परिश्रम है | ''







































