भारतीय वैज्ञानिक : बीरबल साहनी

शुक्रवार, 5 जून 2020

बीरबल साहनी

             बीरबल साहनी 

 सन 1932 में एक विदेशी वैज्ञानिक लखनऊ विश्वविद्यालय में बीरबल साहनी से मिलने आया | वह भारत के एक महान पेलियोबॉटनिस्ट (जीवाश्म वनस्पति विज्ञानी) थे | उन्हें छोटे वनस्पति संग्रहालय के एक कोने में बैठा देखकर वह विस्मित सा रह गया |  " हैल्लो प्रोफेसर साहनी , " वह उनसे हाथ मिलाता हुआ बोला,  " आपके पास बैठने का स्वयं का कमरा तक नहीं है | "
" महान वैज्ञानिको ने दुछत्तियो तक में बैठकर काम किया है, " साहनी साहब ने उत्तर दिया|
            पिछले युग कि वनस्पतियों का अध्धयन इस देश के लिए एक नया विज्ञान था| इसे जीवाश्म वनस्पति विज्ञान (पेलियोबॉटनी ) कहते हैं | ऐसे उपकरण उपलब्ध नहीं थे जिससे चट्टान को काटा या पीसा जा सके | और उनमें अंकित लुप्त वनस्पति जीवाश्मों का अध्धयन किया जा सके | साहनी अपना बहुत सा समय स्वयं अपने कुशल हाथों से यह काम करते हुए बिताते | वह अपने पैसे से ही नए उपकरण भी खरीदते | वास्तव में जीवाश्म वनस्पति विज्ञान के अध्धयन को समर्पित एक संस्थान का निर्माण उनकी महत्वाकांक्षा थी |

          अध्यापक होने के नाते साहनी ने पहले वनस्पति विज्ञान विभाग में पढ़ाने का स्तर ऊंचा किया | इसके बाद उन्होंने भूविज्ञान विभाग कि स्थापना की | उनके सपनों की संस्था इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेलियोबॉटनी की स्थापना उसके बाद हुई | यह दुनिया में अपने तरह की पहली संस्था थी | सन 1941 में जब श्री जवाहर लाल नेहरू ने इस संस्था की इमारत की आधारशिला रखी तो उसके एक सप्ताह बाद ही साहनी जी का स्वर्गवास हो गया | उनके अधूरे कार्य को उनकी पत्नी ने पूरा किया | आज यह संस्था बीरबल साहनी
इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेलियोबॉटनी के नाम से प्रसिद्ध है |

                साहनी का जन्म 14 नवंबर सन   1891 में पंजाब के भेरा नामक नगर में हुआ जो अब पाकिस्तान में है | उनके पिता रसायन विज्ञान के अध्यापक थे  जिन्हे प्रकृति अध्ययन में बड़ी दिलचस्पी थी | गर्मी की छुट्टियों में पिता अपने पुत्र को पहाड़ो में घुमाने ले जाते थे | वे साथ साथ चट्टानों के टुकड़े  पौधे और जीवाश्म वाली चट्टानें इकट्ठा करते| युवा साहनी वनस्पति और भूविज्ञान में इतनी रूचि लेने लगे कि उन्होंने अपने पिता कि इच्छा के विरुद्ध इन्हे अपनी जीविका का साधन भी बना लिया | उनके पिता चाहते थे कि वह इंडियन सिविल सर्विस में प्रवेश लें |
            सन 1911 में पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से बी . ए. पास करके वह ब्रिटेन चले गए | सन 1919 में उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय से डी. एससी. की  डिग्री प्राप्त की | इसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक ऐ .सी. स्टुअर्ड के निर्देशन में फ़र्न,  कोनिफर्स और जीवाश्म पौधों पर शोध कार्य किया | वह प्रथम भारतीय थे जिन्हे सन 1929 में कैंब्रिज से  डी. एससी की डिग्री मिली | सन 1936 में वह रॉयल सोसायटी के सदस्य चुने गए |
      वह प्रथम वनस्पति वैज्ञानिक थे जिन्होंने इंडियन गोंडवाना के पेड़ पौधों का विस्तार से अध्ययन किया | उन्होंने बिहार की राजमहल पहाड़ियों की भी खोजबीन की | वहाँ उन्होंने पौधों के कुछ नए जीन्स की खोज की | उनके कुछ आविष्कारों ने प्राचीन पौधों और आधुनिक पौधों के बीच विकासक्रम के सम्बन्ध को समझने में मदद की |
         उन्होंने एक नए समूह के जीवाश्म पौधों की खोज की | ये जिम्नोस्पर्म हैं | चीड़ तथा उनकी जाति के दूसरे पेड़ जिन्हे पेंटोजाइलीज कहते हैं |

       साहनी एक भू विज्ञानी भी थे | इसके अतिरिक्त साहनी की पुरातत्व विज्ञान में भी बड़ी रूचि थी | उनकी एक खोज यात्रा में उन्हें सन 1936 में रोहतक में सिक्के बनाने के सांचे मिले थे | प्राचीन भारत में सिक्के ढालने के तरीको के अध्ययन और खोज पर उन्हें न्यू मिस्मैटिक सोसायटी ऑफ़ इंडिया la नेलसन राइट मेडल भी मिला | वह चित्रकला और क्ले मॉडलिंग में भी बहुत दक्ष थे | उनके पास डाक टिकटों और सिक्कों का भी एक बहुत बड़ा संग्रह था |  

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