भारतीय वैज्ञानिक : सालिम अली

सोमवार, 13 जुलाई 2020

सालिम अली

                सालिम अली

एक धमाका! एक पक्षी कुछ क्षण तक फड़फड़ाया और फिर जमीन पर गिर पड़ा| एक 10 वर्षीय चश्माधारी बालक जिसने पक्षी पर गोली चलाई थी, भाग कर आया और उसे उठा लिया| पक्षी गौरैया चिड़िया जैसा लगता था मगर यह देखकर बालक को आश्चर्य हुआ कि उसके गले पर पीला धब्बा था| दुविधा में पड़कर बालक उस पक्षी को अपने चाचा अमीरुद्दीन तैयबजी जो खूंखार जानवरों के शिकारी थे, के पास ले गया और पूछा कि यह  किस किस्म की चिड़िया है? उसके चाचा इस बारे में कुछ नहीं जानते थे| लेकिन वह बालक को बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के ऑफिस में ले गए-- अपोलो स्ट्रीट पर एक बड़े भवन में एक छोटा सा कमरा| लड़के का परिचय डब्लू. एस. मिलार्ड  से, जो सोसाइटी के अवैतनिक सचिव थे, से कराया गया |
     मिलार्ड को यह  देखकर आश्चर्य हुआ कि एक भारतीय लड़का पूछ रहा है कि उसने कौन सी है चिड़िया मारी है |वह उसे उस कमरे में ले गए जहां तरह तरह के मरे हुए पक्षियों के शरीरों में भूसा भरकर रखा  हुआ था| एक के बाद दूसरे दराज खोले गए और तरह तरह की चिड़िया दिखाई गई |लड़के ने शायद यह  कल्पना भी नहीं की थी कि पक्षी भी इतने प्रकार की होते हैं|

            वह आश्चर्यचकित देखता रहा जब मिलार्ड ने एक दराज खोला  जिसमें तरह-तरह की गौरैया रखी थी| सावधानी से देखकर मिलार्ड ने एक मरा हुआ पक्षी उठाया| वह पक्षी बिल्कुल वैसा ही था जैसा बालक अपने साथ लाया था| यह एक नर बया  पक्षी था| वह केवल वर्षा ऋतु में ही पहचाना जा सकता है जब उसके गले पर पीला धब्बा उभर आता है|
             लड़के  ने विस्मित होकर कहा मिलार्ड अंकल, मुझे नहीं पता था कि इतनी तरह के पक्षी होते हैं| मैं उनके बारे में सीखना चाहता हूं| मिलार्ड ने मुस्कुराकर सिर हिलाया|उन्होंने अब तक पक्षियों के बारे में जानने के लिए किसी वयस्क में भी विशेष उत्साह नहीं देखा था| उसके पश्चात वह बालक प्रायः  वहां आने लगा| वह सीखने लगा कि पक्षियों को कैसे पहचाना जाता है |बड़े पक्षी को सुरक्षित रखने के लिए उनके शरीर को कैसे भरा जाता है|

      इस बालक का नाम था सलीम मोइजुद्दीन अब्दुल अली जिन्हें सारा संसार असाधारण पक्षी प्रेमी सालिम अली के नाम से जानता है| उनका जन्म 12 नवंबर सन 1896 में हुआ था| अपनी उम्र के नवें दशक में पहुंचकर भी पक्षियों में उनकी रुचि वैसे ही है जैसे तब थी जब वह पहले पहल मिलार्ड  से मिले थे| उन्होंने पक्षियों के संरक्षण के लिए जो योगदान दिया है उसके लिए उन्हें जे. पाल  गेटी वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन प्राइज मिला है|उन्हें कई राष्ट्रीय सम्मान और पुरस्कार भी मिल चुके हैं|
          आश्चर्य की बात यह है कि सालिम अली के पास किसी विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं है| यद्यपि उन्होंने कालेज में प्रवेश लिया था मगर बीजगणित और लोगरिथम से डर कर पढ़ाई छोड़कर भाग खड़े हुए| वह अपने भाई की वुल्फ्रेम माइनिंग में मदद करने वर्मा चले गए लेकिन यहां भी यह असफल रहे| यह वर्मा के जंगलों में वुल्फ्रेम के बदले पक्षियों की खोज करने लगे|
            घर लौटने पर उन्होंने प्राणी शास्त्र में एक कोर्स कर लिया और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के अजायबघर में गाइड नियुक्त हो गए| वह पक्षियों की चमड़ी उतारने और उन्हें भरने की उच्च प्रशिक्षण लेने के लिए जर्मनी गए| 1 वर्ष बाद लौटने पर उन्होंने पाया कि उनकी नौकरी चली गई है और वह बेकार हो गए हैं| पैसे की कमी के कारण उनकी अनुपस्थिति में उनका पद ही समाप्त कर दिया गया था|

           सालिम अली विवाहित थे और काम की सख्त जरूरत थी| लेकिन उन्हें ज्यादा से ज्यादा क्लर्क का काम मिलने की उम्मीद थी और उसके बाद उन्हें अपने मनचाहे काम बर्डवाचिंग के लिए अधिक समय नहीं मिल सकता था|
               सौभाग्य से उनकी पत्नी की कुछ निजी आय थी जिससे इन्हें बहुत सहारा मिला| उन्होंने बंदरगाह के पार किहिम  में एक छोटा सा घर ले लिया|
             यह  घर पेड़ों के बीच बना हुआ था और वहां बड़ी शांति थी| जब वर्षा ऋतु आई तो सालिम अली ने देखा कि घर के पास ही बयां पक्षियों ने एक पेड़ पर अपनी बस्ती बनाई है| तब तक बया पक्षी के बारे में लोगों को कुछ ज्यादा जानकारी नहीं थी| इन पक्षियों का अध्ययन करने का सालिम अली के लिए यह सुनहरा अवसर था| तीन चार महीने तक वह रोज घंटों बैठे बड़े धैर्य से इन पक्षियों को वहां कार्यरत देखते रहे| सन् 1930 में इस अध्ययन के परिणाम को प्रकाशित किया तो उन्हें पक्षी विज्ञान (ओर्निथोलॉजी) में खूब ख्याति मिली|

              जो महीने उन्होंने बया पक्षियों का अध्ययन करते हुए बिताए थे उससे उन्हें स्वयं परीक्षण और प्रेक्षण का महत्व समझ में आया|और यह भी जान गए कि आंखें बंद करके किसी की बात को चाहे वह कितनी भी प्रसिद्ध व्यक्ति ने क्यों ना कही  हो स्वीकार नहीं करना चाहिए| वह अपने पर्यवेक्षण के परिणामों को बार बार जांचते  थे और जल्दी किसी परिणाम पर नहीं पहुंचते थे| इससे इनके विचारों और राय को अधिकारिक माना जाने लगा है, और इसी कारण कई बार उनका टकराव वरिष्ठ पक्षी प्रेमियों से हुआ|

          इसका प्रसिद्ध उदाहरण है रैकेट टेल्ड ड्रॉन्गो में दुम के परो  का निकलना| एक प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी ने कहा कि सालिम अली का परीक्षण गलत है, लेकिन फिर अंततः सालिम अली ही ठीक निकले| उनकी फिन बयां की खोज भी महत्वपूर्ण योगदान है |समझा जाता था  कि 100 वर्ष से वह पक्षी विलुप्त हो गया है मगर सालिम अली ने कुमायूं की पहाड़ियों में उसे खोज निकाला|

              अपने बचपन में सालिम अली को भारतीय पक्षियों पर एक अच्छी पुस्तक की कमी बहुत खलती थी| जो कुछ पुस्तकें उपलब्ध थी उनमें चित्र ही नहीं थे और इनमें केवल उकता देने वाला विस्तृत वर्णन था| ऐसी पुस्तकें किसी का पक्षियों के प्रति उत्साह बढ़ाने के स्थान पर उसे बिल्कुल खत्म कर देती हैं, विशेषकर बच्चों में| सन 1941 में उन्होंने यह कमी पूरी करने की कोशिश की और बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स लिखी| उसमें सुंदर वर्णन भी था और प्रत्येक जाति का सुंदर चित्र भी | किसी अजनबी के लिए भी उसे देखकर पक्षी पहचानना आसान हो गया| सन 1948 में उन्होंने प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी एस.  डिलन रीप्ले के साथ एक अन्य महत्वाकांक्षी योजना पर काम आरंभ किया| दोनों ने 10 खंडों में एक पुस्तक लिखी "हैंडबुक ऑफ़ द बर्ड्स ऑफ़ इंडिया एंड पाकिस्तान"| इस पुस्तक में इस उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले सभी पक्षियों के बारे में जानकारी है| उनकी आकृति, वे कहाँ मिलते हैं, उनकी प्रजनन की आदतें, प्रवजन (माइग्रेशन) और यह भी कि उनके बारे में और क्या जानना बाकी है|
               सालिम अली बर्ड वाचिंग के लिए सारे देश में घूमे हैं| कहा जाता है कि देश का ऐसा कोई कोना नहीं जहां उन्होंने अपने रबर के भारी जूतों के चिन्ह ना छोड़े हैं|

               सन 1987 में सालिम अली की मृत्यु हो गई| इन्हें "बर्ड मैन ऑफ इंडिया" कहा जाता है|





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