हरगोबिंद खुराना
भारत एक ऐसा देश है जहाँ कि धरती से अनेकों वैज्ञानिक समय समय पर पैदा हुए और भारत कि शान को पुरे विश्व में बढ़ा कर भारत का नाम रौशन किया |
ऐसे ही एक वैज्ञानिक थे - हरगोबिंद खुराना|
हरगोबिंद खुराना का जन्म भारत में हुआ | माना जाता है उनका जन्म 9 फरवरी 1922 में हुआ , उनकी वास्तविक जन्मतिथि का पता नहीं है | उनके पिता रायपुर ( अब पाकिस्तान ) गाँव के टैक्स कलक्टर थे | उस नन्हे से गाँव में, जहाँ करीब सौ लोग रहते थे, केवल उनका परिवार ही पढ़ा - लिखा था |
बालक हरगोबिंद खुराना ने पहला पाठ गाँव के अध्यापक से एक बड़े पेड़ कि छाया में बैठ कर पढ़ा | उन्होंने रसायन शास्त्र में बी .एससी. और एम.एससी. की डिग्री लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय से ली | वह सन 1945 में भारत सरकार की छात्रवृत्ति पर लिवरपूल विश्वविद्यालय में पी .एच. डी. करने के लिए गए | कार्बनिक रसायन शास्त्र में पी .एच. डी. करने के बाद जब वह देश में वापस आये तो उन्हें उपयुक्त काम नहीं मिला | जब अध्यापक के पद के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में दिया प्रार्थना पत्र भी अस्वीकार हो गया तो उन्होंने विदेश जाने का निश्चय किया |
हरगोबिंद खुराना ने सन 1959 में एक रसायन ' को एंजाइम ए 'का उत्पादन करके ख्याति पाई | यह रसायन मनुष्य के शरीर की कुछ प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य है| उस समय वह कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में कार्यरत थे | वहाँ से वह यू. एस. ए. में विस्कांसिन विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ़ एंजाइम रिसर्च में आये | सन 1970 में वह मेसाच्यूट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में जीव विज्ञान एवं रसायन के प्रोफेसर बने |
46 वर्ष की उम्र में खुराना ने मार्शल डब्ल्यू .निरेनबर्ग और रोबर्ट डब्ल्यू .हॉली के साथ 1968 में सम्मिलित रूप से चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया |तीनों ने अलग अलग काम करके जेनेटिक कोड को समझने में योगदान दिया था |
एशरिकिआ कोली ऐसा जीवाणु है जो मनुष्यों और जानवरों की अंतड़ियों में रहता है | कैम्ब्रिज ,ब्रिटेन में वैज्ञानिकों की टीम ने पहले ही इसकी संरचना का पता लगा लिया था | खुराना और उनकी टीम ने इस जीवाणु का जीन प्रयोगशाला में बनाने का निश्चय किया | धीरे धीरे उन्होंने एशरिकिआ कोली के 207 जीन बना डाले | इसका चरमोत्कर्ष अगस्त 1976 में हुआ जब इस मनुष्यकृत जीन को एशरिकिआ कोली में डाला गया और वह प्राकृतिक जीन कई तरह काम करने लगा |
इस उपलब्धि को संसार भर में आधुनिक जीव विज्ञान की एक महत्वपूर्ण सफलता मान कर सराहा गया |
एशरिकिआ कोली के एक जीन का उत्पादन करने में खुराना और उनके साथियों को 9 वर्ष का अथक श्रम करना पड़ा था |मनुष्य का जीन बनाने की सम्भावना अभी दूर है परन्तु शायद सपना नहीं है |अब धीरे धीरे मनुष्य का जीन बनाने पर भी काम शुरू हो गया है |
हरगोबिंद खुराना की मृत्यु 9 नवंबर सन 2011 को 89 वर्ष कई अवस्था में मेसाच्यूट्स यू .एस .में हो गयीं |
सम्मान -
(1)गैर्डनर फॉउंडेशन इंटरनेशनल अवार्ड
(2)लुईसा फॉउंडेशन इंटरनेशनल अवार्ड
(3) बेसिक मेडिकल रिसर्च के लिए एल्बर्ट लॉस्कर पुरस्कार
(4) पद्म विभूषण
(5) 1968 में चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार
भारत एक ऐसा देश है जहाँ कि धरती से अनेकों वैज्ञानिक समय समय पर पैदा हुए और भारत कि शान को पुरे विश्व में बढ़ा कर भारत का नाम रौशन किया |
ऐसे ही एक वैज्ञानिक थे - हरगोबिंद खुराना|
हरगोबिंद खुराना का जन्म भारत में हुआ | माना जाता है उनका जन्म 9 फरवरी 1922 में हुआ , उनकी वास्तविक जन्मतिथि का पता नहीं है | उनके पिता रायपुर ( अब पाकिस्तान ) गाँव के टैक्स कलक्टर थे | उस नन्हे से गाँव में, जहाँ करीब सौ लोग रहते थे, केवल उनका परिवार ही पढ़ा - लिखा था |
बालक हरगोबिंद खुराना ने पहला पाठ गाँव के अध्यापक से एक बड़े पेड़ कि छाया में बैठ कर पढ़ा | उन्होंने रसायन शास्त्र में बी .एससी. और एम.एससी. की डिग्री लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय से ली | वह सन 1945 में भारत सरकार की छात्रवृत्ति पर लिवरपूल विश्वविद्यालय में पी .एच. डी. करने के लिए गए | कार्बनिक रसायन शास्त्र में पी .एच. डी. करने के बाद जब वह देश में वापस आये तो उन्हें उपयुक्त काम नहीं मिला | जब अध्यापक के पद के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में दिया प्रार्थना पत्र भी अस्वीकार हो गया तो उन्होंने विदेश जाने का निश्चय किया |
हरगोबिंद खुराना ने सन 1959 में एक रसायन ' को एंजाइम ए 'का उत्पादन करके ख्याति पाई | यह रसायन मनुष्य के शरीर की कुछ प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य है| उस समय वह कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में कार्यरत थे | वहाँ से वह यू. एस. ए. में विस्कांसिन विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ़ एंजाइम रिसर्च में आये | सन 1970 में वह मेसाच्यूट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में जीव विज्ञान एवं रसायन के प्रोफेसर बने |
46 वर्ष की उम्र में खुराना ने मार्शल डब्ल्यू .निरेनबर्ग और रोबर्ट डब्ल्यू .हॉली के साथ 1968 में सम्मिलित रूप से चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया |तीनों ने अलग अलग काम करके जेनेटिक कोड को समझने में योगदान दिया था |
एशरिकिआ कोली ऐसा जीवाणु है जो मनुष्यों और जानवरों की अंतड़ियों में रहता है | कैम्ब्रिज ,ब्रिटेन में वैज्ञानिकों की टीम ने पहले ही इसकी संरचना का पता लगा लिया था | खुराना और उनकी टीम ने इस जीवाणु का जीन प्रयोगशाला में बनाने का निश्चय किया | धीरे धीरे उन्होंने एशरिकिआ कोली के 207 जीन बना डाले | इसका चरमोत्कर्ष अगस्त 1976 में हुआ जब इस मनुष्यकृत जीन को एशरिकिआ कोली में डाला गया और वह प्राकृतिक जीन कई तरह काम करने लगा |
इस उपलब्धि को संसार भर में आधुनिक जीव विज्ञान की एक महत्वपूर्ण सफलता मान कर सराहा गया |
एशरिकिआ कोली के एक जीन का उत्पादन करने में खुराना और उनके साथियों को 9 वर्ष का अथक श्रम करना पड़ा था |मनुष्य का जीन बनाने की सम्भावना अभी दूर है परन्तु शायद सपना नहीं है |अब धीरे धीरे मनुष्य का जीन बनाने पर भी काम शुरू हो गया है |
हरगोबिंद खुराना की मृत्यु 9 नवंबर सन 2011 को 89 वर्ष कई अवस्था में मेसाच्यूट्स यू .एस .में हो गयीं |
सम्मान -
(1)गैर्डनर फॉउंडेशन इंटरनेशनल अवार्ड
(2)लुईसा फॉउंडेशन इंटरनेशनल अवार्ड
(3) बेसिक मेडिकल रिसर्च के लिए एल्बर्ट लॉस्कर पुरस्कार
(4) पद्म विभूषण
(5) 1968 में चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार




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