विकिरण द्वारा प्रेरित निस्सारण से होने वाला प्रकाश संवर्धन ही लेसर है| यद्यपि यह साधारण प्रकाश की तरह होता है लेकिन लेसर फिर भी बहुत अलग है| बल्ब के फिलामेंट परमाणु बिजली से उर्जा लेकर उसे प्रकाश के रूप में छोड़ते हैं| इस उदाहरण में परमाणु उस भीड़ की तरह व्यवहार करते हैं जिसके कदम ठीक ना पड रहे हों| लेसर के उदाहरण में परमाणुओं को प्रेरित या विवश किया जाता है कि वे सेना की एक बटालियन की तरह व्यवहार करें और उनके कदम बिल्कुल सुव्यवस्थित ढंग से पडें|
इसलिए लेसर अत्यंत अनुशासित प्रकार का प्रकाश होता है| उसमें सामान्य प्रकाश के विपरीत ढेर सारी ऊर्जा होती है|
लेसर को इसके परमाणु के स्रोत के अनुरूप ठोस, द्रव या गैस लेसर कहते हैं| गैस के लेसर में गैस या गैसों के अणु या परमाणुओं को लेसर प्रकाश देने के लिए प्रेरित किया जाता है| इस तरह के लेसर का आविष्कार 1960 में हुआ| यह शुद्ध और तीक्ष्ण लेसर किरणों का उत्पादन कर सकता था| लेकिन इसमें एक कमी थी कि इसे हर रोज के जीवन में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था| यह कम शक्तिशाली था| अत्यंत शक्तिशाली कार्बन डाइऑक्साइड लेसर के आविष्कार के पश्चात ही लेसर का विज्ञान और तकनीक की कई शाखाओं में व्यवहारिक उपयोग होने लगा| अब लेसर में इतनी उर्जा उत्पन्न हो सकती है कि वह इस्पात की चादर को कुछ ही क्षणों में काट दे|
कार्बन डाइऑक्साइड लेसर का आविष्कार चंद्रकुमार नरानभाई पटेल ने किया था जो इस समय फिजिकल रिसर्च लैबोरेट्री, बेल लेबोरेटरी, यू.एस.ए के निदेशक हैं| 1974 में वह सबसे छोटी उम्र के वैज्ञानिक थे जिन्हें नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस का सदस्य चुना गया था| इसके अतिरिक्त उन्हें बैलंटाइन मेडल, ज्वोरिकिन एवार्ड और लैमे मेडल भी मिल चुके हैं|
उनका जन्म 2 जुलाई सन 1938 में पुणे के निकट बारामती में हुआ| उनके पिता नहर के महकमें में इंजीनियर थे| बचपन से ही उन्हें यह जानने का शौक था की चीजें या खिलौने कैसे कार्य करते हैं| घर में जब भी किसी यंत्र या उपकरण की मरम्मत होती वह उस पर झपट पड़ते| उसे खोलकर व फिर से जोड़ देते| उनके पिता कहते हैं कि वह मरम्मत का काम बड़ी निपुणता से करते थे|
स्कूल में उनका रिकॉर्ड अति उत्तम था| स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्हें पुणे के इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिला| सन 1948 में उन्होंने दूरसंचार (टेलीकम्युनिकेशन) में बी.ई. की डिग्री प्राप्त की| इसमें उन्हें सबसे अधिक नंबर मिले जिससे उन्हें पुणे विश्वविद्यालय का पी.आर. बस्तीकर पुरस्कार मिला| उच्च शिक्षा के लिए वह यू.एस.ए. गए और 23 वर्ष की आयु में विद्युत इंजीनियरिंग में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की| उसी वर्ष उन्होंने बेल लैबोरेट्रीज में नियुक्ति ले ली|
पटेल के आविष्कार का कई क्षेत्रों में उपयोग होने लगा है| वह केवल शक्तिशाली प्रकाश ही उत्पन्न नहीं करता अपितु इस उत्पादित प्रकाश का अधिकांश भाग अदृश्य अवरक्त क्षेत्र में उत्पन्न होता है| वायुमंडल साधारण प्रकाश की तुलना में अवरक्त प्रकाश को बहुत कम ग्रहण करता है| इसलिए इस लेसर प्रकाश का इस्तेमाल पृथ्वी पर कहीं भी और अंतरिक्ष में संदेश भेजने के लिए किया जा सकता है| पटेल ने प्रमाणित कर दिया कि वातावरण के प्रदूषण का पता लगाने के लिए भी इसका उपयोग किया जा सकता है| गैसों, द्रवों और ठोसों के अध्ययन के लिए यह एक शक्तिशाली उपकरण प्रमाणित हुआ है|