सत्येंद्र नाथ बोस
भारत में एक से बढ़ कर एक अनेक वैज्ञानिको ने समय समय पर दुनिया में अपना परचम फहराया , और भारत की छवि को विश्व में ऊपर उठाने का काम किया है | ऐसे ही एक भारतीय वैज्ञानिक थे एस .एन .बोस |
जब शिक्षा शास्त्री आशुतोष मुखर्जी ने कलकत्ता में यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ साइंस की स्थापना की तो कॉलेज में ढंग का पुस्तकालय नहीं था | सन 1916 में जब दो प्रतिभाशाली युवकों ने कॉलेज में प्राध्यापक पद संभाला तो उनका लक्ष्य था भौतिकी और गणित में शोध कार्य | लेकिन पुस्तकालय की दशा देखकर उन्हें बड़ी निराशा हुई |
यह उन दिनों की बात है जब भौतिकी में एक क्रांति हो रही थी और आधुनिक भौतिक शास्त्र अपना आकार लें रहा था | जर्मन भौतिक शास्त्री मैक्स प्लान्क ने क्वांटम थ्योरी पेश की थी | अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने आपेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत किया था | इसके अतिरिक्त परमाणु की आंतरिक संरचना को समझने में भी बहुत प्रगति हो रही थी | यद्यपि अन्य प्राध्यापक पुराना भौतिक शास्त्र ही पढ़ा कर संतुष्ट थे मगर ये दोनों युवक जानना चाहते थे कि अब आधुनिक भौतिक शास्त्र में कितनी प्रगति हुई है |
यह जरा कठिन था | प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था, इस कारण नवीनतम पुस्तकें और पत्रिकाएं भारत में नहीं पहुँच रही थी | निराश होकर दोनों ने पुस्तकें ढूढ़नी शुरू कर दी | एक जर्मन वैज्ञानिक पी .जे. ब्रुहल जो उस समय देश में ही रह रहे थे, के पास आधुनिक भौतिक शास्त्र पर कुछ पुस्तकें और लेख थे | किन्तु ये सब जर्मन भाषा में थे |
दोनों वैज्ञानिक अपनी खोज में लगे रहे |उन्होंने जर्मन भाषा सीखी | कुछ समय बाद अध्यापक और उनके शिष्य उन्हें आधुनिक भौतिकी कि नई खोज पर विवेचना करते हुए देखने लगे |
सन 1920 में उन्होंने अल्बर्ट आइन्स्टाइन के आपेक्षता के सिद्धांत सम्बन्धी शोधपत्रों का जर्मन भाषा से अंग्रेजी में अनुवाद किया |
ये दो युवक और कोई नहीं, सत्येंद्र नाथ बोस और मेघनाद साहा थे | कुछ समय तक उन्होंने साथ साथ शोधकार्य किया फिर साहा विदेश चले गए और बोस ढाका यूनिवर्सिटी में कार्य करने लगे |
बोस के जीवन में यह एक नया मोड़ था | इनका एक मित्र जो अभी अभी विदेश से लौटा था उसने इन्हे मैक्स प्लान्क कि प्रसिद्ध पुस्तक "थर्मोडायनमिक्स एंड हीट" उपहार के तौर पर दी | इस पुस्तक में प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री के मूल लेख थे | बोस ने उसे पढ़ने के बाद स्वयं ही इक्वेशन और फॉर्मूले हल कर लिए |
फिर भी वह एक स्थान पर अटक गए | प्लान्क ने एक स्थान पर परिकल्पना से एक इक्वेशन कि अनुमानित गणना कर लीं थी |" किसी विचार को तब तक स्वीकार नहीं करना चाहिए जब तक तुम स्वयं उससे संतुष्ट नहीं होते " यह बोस का आदर्श था | इसलिए उन्होंने इस पर काम करना शुरू किया और इस दौरान थ्योरेटिकल या मैथमेटिकल फिज़िक्स के विकास में कीर्तिमान स्थापित कर दिए | उस समय बोस कि आयु करीब 30 वर्ष कि होगी |
बोस ने 4 पन्ने का अपना शोध लेख " प्लांक्स लॉ एंड लाइट क्वांटम हाइपोथिसिस " एक भारतीय पत्रिका के पास भेजा और फिर कई विदेशी पत्रिकाओं को | सबने उसे अस्वीकार कर दिया |
सन 1924 में हताश होकर बोस ने अपना लेख अल्बर्ट आइन्स्टाइन को भेजा | बोस ने अपने उस लेख में एक दुस्साहसी विचार रखा था जिसने अल्बर्ट आइन्स्टाइन को बहुत प्रभावित किया | यहाँ तक कि अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने उस पेपर का स्वयं जर्मन में अनुवाद किया और एक पत्रिका में प्रकाशित करवाया |
बोस के पेपर ने एक नए प्रकार की सांख्यिकी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |
विकिरण के व्यवहार को समझाने के लिए उन्होंने जो सांख्यिकी हल की उसे बोस स्टेटिस्टिक्स कहते हैं | मूल तत्व के कण जैसे फोटोन्स और अल्फा कण जो बोस सांख्यिकी के सिद्धांत को मानते हैं उन्हें बोसोन्स कहा जाता है | इस प्रकार उनका नाम विज्ञान का एक भाग बन गया |
बोस का जन्म 1 जनवरी सन 1894 में हुआ था | जब वह स्कूल में ही थे तो लोग समझने लगे थे कि वह पियरे साइमन लैपलेस और ऑगस्टिन लुई काउची जैसा प्रसिद्ध गणितज्ञ बनेगा | प्रश्नों को हल करने कि उसकी प्रतिभा उसके अध्यापकों को इतना प्रभावित करती थी कि वह उसे 100 में से 110 अंक दें दिया करते थे | उनकी महत्वपूर्ण खोज के 34 वर्ष बाद अपने जीवन के अंत में उन्हें रॉयल सोसायटी का सदस्य चुना गया |
बोस ने भौतिकी को अन्य शाखाओं में जैसे एक्स - रे क्रिस्टलोग्राफी और उष्मागतिकी पर भी प्रयोग किये | उन्होंने एक रासायनिक यौगिक भी बनाया जो आज तक आँखों में दवाई के तौर पर डाला जाता है|
कलकत्ते में उनकी खोज बोस स्टेटिस्टिक्स कि स्वर्ण जयंती के सम्मान में एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार हुआ | उस अवसर पर बोस ने कहा कि अब उन्हें और जीने कि इच्छा नहीं है क्योंकि उनकी खोज को पुरे संसार में मान्यता मिल गयीं है | एक महीने बाद 4 फरवरी सन 1974 को उनका देहांत हो गया | उनकी मेज पर एक आधी हल की हुई समस्या पड़ी थी | यह समस्या संख्या सिद्धांत से सम्बंधित थी |
भारत में एक से बढ़ कर एक अनेक वैज्ञानिको ने समय समय पर दुनिया में अपना परचम फहराया , और भारत की छवि को विश्व में ऊपर उठाने का काम किया है | ऐसे ही एक भारतीय वैज्ञानिक थे एस .एन .बोस |
जब शिक्षा शास्त्री आशुतोष मुखर्जी ने कलकत्ता में यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ साइंस की स्थापना की तो कॉलेज में ढंग का पुस्तकालय नहीं था | सन 1916 में जब दो प्रतिभाशाली युवकों ने कॉलेज में प्राध्यापक पद संभाला तो उनका लक्ष्य था भौतिकी और गणित में शोध कार्य | लेकिन पुस्तकालय की दशा देखकर उन्हें बड़ी निराशा हुई |
यह उन दिनों की बात है जब भौतिकी में एक क्रांति हो रही थी और आधुनिक भौतिक शास्त्र अपना आकार लें रहा था | जर्मन भौतिक शास्त्री मैक्स प्लान्क ने क्वांटम थ्योरी पेश की थी | अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने आपेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत किया था | इसके अतिरिक्त परमाणु की आंतरिक संरचना को समझने में भी बहुत प्रगति हो रही थी | यद्यपि अन्य प्राध्यापक पुराना भौतिक शास्त्र ही पढ़ा कर संतुष्ट थे मगर ये दोनों युवक जानना चाहते थे कि अब आधुनिक भौतिक शास्त्र में कितनी प्रगति हुई है |
यह जरा कठिन था | प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था, इस कारण नवीनतम पुस्तकें और पत्रिकाएं भारत में नहीं पहुँच रही थी | निराश होकर दोनों ने पुस्तकें ढूढ़नी शुरू कर दी | एक जर्मन वैज्ञानिक पी .जे. ब्रुहल जो उस समय देश में ही रह रहे थे, के पास आधुनिक भौतिक शास्त्र पर कुछ पुस्तकें और लेख थे | किन्तु ये सब जर्मन भाषा में थे |
दोनों वैज्ञानिक अपनी खोज में लगे रहे |उन्होंने जर्मन भाषा सीखी | कुछ समय बाद अध्यापक और उनके शिष्य उन्हें आधुनिक भौतिकी कि नई खोज पर विवेचना करते हुए देखने लगे |
सन 1920 में उन्होंने अल्बर्ट आइन्स्टाइन के आपेक्षता के सिद्धांत सम्बन्धी शोधपत्रों का जर्मन भाषा से अंग्रेजी में अनुवाद किया |
ये दो युवक और कोई नहीं, सत्येंद्र नाथ बोस और मेघनाद साहा थे | कुछ समय तक उन्होंने साथ साथ शोधकार्य किया फिर साहा विदेश चले गए और बोस ढाका यूनिवर्सिटी में कार्य करने लगे |
बोस के जीवन में यह एक नया मोड़ था | इनका एक मित्र जो अभी अभी विदेश से लौटा था उसने इन्हे मैक्स प्लान्क कि प्रसिद्ध पुस्तक "थर्मोडायनमिक्स एंड हीट" उपहार के तौर पर दी | इस पुस्तक में प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री के मूल लेख थे | बोस ने उसे पढ़ने के बाद स्वयं ही इक्वेशन और फॉर्मूले हल कर लिए |
फिर भी वह एक स्थान पर अटक गए | प्लान्क ने एक स्थान पर परिकल्पना से एक इक्वेशन कि अनुमानित गणना कर लीं थी |" किसी विचार को तब तक स्वीकार नहीं करना चाहिए जब तक तुम स्वयं उससे संतुष्ट नहीं होते " यह बोस का आदर्श था | इसलिए उन्होंने इस पर काम करना शुरू किया और इस दौरान थ्योरेटिकल या मैथमेटिकल फिज़िक्स के विकास में कीर्तिमान स्थापित कर दिए | उस समय बोस कि आयु करीब 30 वर्ष कि होगी |
बोस ने 4 पन्ने का अपना शोध लेख " प्लांक्स लॉ एंड लाइट क्वांटम हाइपोथिसिस " एक भारतीय पत्रिका के पास भेजा और फिर कई विदेशी पत्रिकाओं को | सबने उसे अस्वीकार कर दिया |
सन 1924 में हताश होकर बोस ने अपना लेख अल्बर्ट आइन्स्टाइन को भेजा | बोस ने अपने उस लेख में एक दुस्साहसी विचार रखा था जिसने अल्बर्ट आइन्स्टाइन को बहुत प्रभावित किया | यहाँ तक कि अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने उस पेपर का स्वयं जर्मन में अनुवाद किया और एक पत्रिका में प्रकाशित करवाया |
बोस के पेपर ने एक नए प्रकार की सांख्यिकी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |
विकिरण के व्यवहार को समझाने के लिए उन्होंने जो सांख्यिकी हल की उसे बोस स्टेटिस्टिक्स कहते हैं | मूल तत्व के कण जैसे फोटोन्स और अल्फा कण जो बोस सांख्यिकी के सिद्धांत को मानते हैं उन्हें बोसोन्स कहा जाता है | इस प्रकार उनका नाम विज्ञान का एक भाग बन गया |
बोस का जन्म 1 जनवरी सन 1894 में हुआ था | जब वह स्कूल में ही थे तो लोग समझने लगे थे कि वह पियरे साइमन लैपलेस और ऑगस्टिन लुई काउची जैसा प्रसिद्ध गणितज्ञ बनेगा | प्रश्नों को हल करने कि उसकी प्रतिभा उसके अध्यापकों को इतना प्रभावित करती थी कि वह उसे 100 में से 110 अंक दें दिया करते थे | उनकी महत्वपूर्ण खोज के 34 वर्ष बाद अपने जीवन के अंत में उन्हें रॉयल सोसायटी का सदस्य चुना गया |
बोस ने भौतिकी को अन्य शाखाओं में जैसे एक्स - रे क्रिस्टलोग्राफी और उष्मागतिकी पर भी प्रयोग किये | उन्होंने एक रासायनिक यौगिक भी बनाया जो आज तक आँखों में दवाई के तौर पर डाला जाता है|
कलकत्ते में उनकी खोज बोस स्टेटिस्टिक्स कि स्वर्ण जयंती के सम्मान में एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार हुआ | उस अवसर पर बोस ने कहा कि अब उन्हें और जीने कि इच्छा नहीं है क्योंकि उनकी खोज को पुरे संसार में मान्यता मिल गयीं है | एक महीने बाद 4 फरवरी सन 1974 को उनका देहांत हो गया | उनकी मेज पर एक आधी हल की हुई समस्या पड़ी थी | यह समस्या संख्या सिद्धांत से सम्बंधित थी |





Excellent work sir
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