भारतीय वैज्ञानिक : जे. वी. नार्लीकर

बुधवार, 23 सितंबर 2020

जे. वी. नार्लीकर

           जे. वी. नार्लीकर 

यह सृष्टि जिसमें असंख्य नक्षत्र, आकाशगंगा और निहारिकायें पाई जाती हैं, कैसे उत्पन्न हुई इस प्रश्न पर दार्शनिक और वैज्ञानिक शताब्दियों से विचार करते आ रहे हैं|
       अब कई वैज्ञानिकों का विश्वास है कि इसकी उत्पत्ति किसी बहुत सघन आणविक वस्तु के धमाके से फटने के कारण हुई है| पटाखे की तरह उसने अंदर के पदार्थ को बाहर फेंका जो बाद में सितारे, आकाशगंगा और निहारिकायें बन गई| इस धमाके के सिद्धांत को big-bang-theory कहते हैं| 
           लेकिन एक भारतीय खगोल भौतिकविद जयंत विष्णु नार्लीकर हैं जो इस बात पर विश्वास नहीं करते और उनका कहना है कि यह सिद्धांत अभी प्रमाणित नहीं हुआ है| वास्तव में एक ऐसा समय था जब वह इसके विरोधी सिद्धांत steady-state में विश्वास करते थे|
          इस सिद्धांत के अनुसार सृष्टि भूत, वर्तमान और भविष्य में सदा एक जैसी रहती है| सितारे, आकाशगंगा और अन्य तत्वों के रूप में पदार्थ सारे संसार में बराबर फैला हुआ है| किसी आकाशगंगा तथा अन्य नक्षत्रों की गति से उत्पन्न होने वाले खाली स्थान को भरने के लिए नया पदार्थ बनता रहता है|
           steady-state सिद्धांत पर काम करने के अतिरिक्त जे. वी. नार्लीकर ने अपने अध्यापक फ्रेड हॉयल के साथ मिलकर गुरुत्व के एक नए सिद्धांत पर काम किया| उस समय इनकी आयु केवल 26 वर्ष की थी|
         तब यह सिद्धांत उतना ही महत्वपूर्ण समझा जाता था जितना आइंस्टीन का अपेक्षाता का सिद्धांत| संसार में जे. वी. नार्लीकर को भारत का आइंस्टीन कहा जाता है| 
         जे. वी. नार्लीकर गणितज्ञों के परिवार में से हैं| उनका जन्म कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में 19 जुलाई 1938 में हुआ| लेकिन उनका लालन-पालन वाराणसी में अपने गणितज्ञ चाचा के घर में हुआ |प्रतिदिन सुबह चाचा ब्लैक बोर्ड पर एक गणित की समस्या लिख देते और उसे तब तक ना मिटाया जाता जब तक जयंत उसे हल न कर लेता| उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.एससी. और पी.एच.डी. की| फिर वह कैंब्रिज के किंग्स कॉलेज में फ्रेड हॉयल के अधीन रिसर्च करने गए| खगोल विज्ञान में अपने शोध कार्य के लिए आपको कई पुरस्कार और मेडल मिले| साथ में छात्रवृत्तियां भी मिलीं|
      जे. वी. नार्लीकर सन 1972 में देश लौट आए| तब से वह खगोल विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में कार्य कर रहे हैं| अब वह अपने छात्रों के साथ टैकीयोन्स पर काम कर रहे हैं जो प्रकाश कणों से भी तेज होते हैं| वह ब्लैक होल्स (कृष्ण विवर) पर भी शोध कार्य कर रहे हैं| ब्लैक होल्स बहुत सिकुड़े हुए खगोलीय पिंड हैं जिनका गुरुत्व बहुत अधिक है| ब्लैक होल के एक चम्मच पदार्थ का भाऱ कई टनों के बराबर होता है| इसलिए यह प्रकाश को भी अपनी सतह से परे नहीं जाने देता| नारलीकर के अनुसार ब्लैक होल टैकीयोन्स का अवशोषण कर लेता है और अपनी सतह का क्षेत्र कम कर सकता है| इसलिए उनका दावा है कि टैकीयोन्स को ढूंढने के लिए ब्लैक होल की खोज करनी चाहिए जो आकार में सिकुड़ते जा रहे हैं|
         नारलीकर विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए बहुत लंबे समय से काम कर रहे हैं और विज्ञान कथाएं (साइंस फिक्शन) भी लिखते हैं|

पुरस्कार-
(1) 1981 मे राष्ट्र भूषण 
(2) 1996 मे यूनेस्को द्वारा कलिंग पुरस्कार 
(3) 2004 मे पद्म भूषण 
(4) 2010 मे महाराष्ट्र भूषण 
(5) 2014 मे साहित्य एकेडमी एवार्ड 
(6) भटनागर एवार्ड 

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