भारतीय वैज्ञानिक

रविवार, 1 नवंबर 2020

सी. के. एन. पटेल

         सी. के. एन. पटेल 
 विकिरण द्वारा प्रेरित निस्सारण से होने वाला प्रकाश संवर्धन ही लेसर है| यद्यपि यह साधारण प्रकाश की तरह होता है लेकिन लेसर फिर भी बहुत अलग है| बल्ब के फिलामेंट परमाणु बिजली से उर्जा लेकर उसे प्रकाश के रूप में छोड़ते हैं| इस उदाहरण में परमाणु उस भीड़ की तरह व्यवहार करते हैं जिसके कदम ठीक ना पड रहे हों| लेसर के उदाहरण में परमाणुओं को प्रेरित या विवश किया जाता है कि वे सेना की एक बटालियन की तरह व्यवहार करें और उनके कदम बिल्कुल सुव्यवस्थित ढंग से पडें|
          इसलिए लेसर अत्यंत अनुशासित प्रकार का प्रकाश होता है| उसमें सामान्य प्रकाश के विपरीत ढेर सारी ऊर्जा होती है|
          लेसर को इसके परमाणु के स्रोत के अनुरूप ठोस, द्रव या गैस लेसर कहते हैं| गैस के लेसर में गैस या गैसों के अणु या परमाणुओं को लेसर प्रकाश देने के लिए प्रेरित किया जाता है| इस तरह के लेसर का आविष्कार 1960 में हुआ| यह शुद्ध और तीक्ष्ण लेसर किरणों का उत्पादन कर सकता था| लेकिन इसमें एक कमी थी कि इसे हर रोज के जीवन में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था| यह कम शक्तिशाली था| अत्यंत शक्तिशाली कार्बन डाइऑक्साइड लेसर के आविष्कार के पश्चात ही लेसर का विज्ञान और तकनीक की कई शाखाओं में व्यवहारिक उपयोग होने लगा| अब लेसर में इतनी उर्जा उत्पन्न हो सकती है कि वह इस्पात की चादर को कुछ ही क्षणों में काट दे|
      कार्बन डाइऑक्साइड लेसर का आविष्कार चंद्रकुमार नरानभाई पटेल ने किया था जो इस समय फिजिकल रिसर्च लैबोरेट्री, बेल लेबोरेटरी, यू.एस.ए के निदेशक हैं| 1974 में वह सबसे छोटी उम्र के वैज्ञानिक थे जिन्हें नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस का सदस्य चुना गया था| इसके अतिरिक्त उन्हें बैलंटाइन मेडल, ज्वोरिकिन एवार्ड और लैमे मेडल भी मिल चुके हैं|
         उनका जन्म 2 जुलाई सन 1938 में पुणे के निकट बारामती में हुआ| उनके पिता नहर के महकमें में इंजीनियर थे| बचपन से ही उन्हें यह जानने का शौक था की चीजें या खिलौने कैसे कार्य करते हैं| घर में जब भी किसी यंत्र या उपकरण की मरम्मत होती वह उस पर झपट पड़ते| उसे खोलकर व फिर से जोड़ देते| उनके पिता कहते हैं कि वह मरम्मत का काम बड़ी निपुणता से करते थे|
           स्कूल में उनका रिकॉर्ड अति उत्तम था| स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद उन्हें पुणे के इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिला| सन 1948 में उन्होंने दूरसंचार (टेलीकम्युनिकेशन) में बी.ई. की डिग्री प्राप्त की| इसमें उन्हें सबसे अधिक नंबर मिले जिससे उन्हें पुणे विश्वविद्यालय का पी.आर. बस्तीकर पुरस्कार मिला| उच्च शिक्षा के लिए वह यू.एस.ए. गए और 23 वर्ष की आयु में विद्युत इंजीनियरिंग में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की| उसी वर्ष उन्होंने बेल लैबोरेट्रीज में नियुक्ति ले ली|
            पटेल के आविष्कार का कई क्षेत्रों में उपयोग होने लगा है| वह केवल शक्तिशाली प्रकाश ही उत्पन्न नहीं करता अपितु इस उत्पादित प्रकाश का अधिकांश भाग अदृश्य अवरक्त क्षेत्र में उत्पन्न होता है| वायुमंडल साधारण प्रकाश की तुलना में अवरक्त प्रकाश को बहुत कम ग्रहण करता है| इसलिए इस लेसर प्रकाश का इस्तेमाल पृथ्वी पर कहीं भी और अंतरिक्ष में संदेश भेजने के लिए किया जा सकता है| पटेल ने प्रमाणित कर दिया कि वातावरण के प्रदूषण का पता लगाने के लिए भी इसका उपयोग किया जा सकता है| गैसों, द्रवों और ठोसों के अध्ययन के लिए यह एक शक्तिशाली उपकरण प्रमाणित हुआ है|

बुधवार, 23 सितंबर 2020

जे. वी. नार्लीकर

           जे. वी. नार्लीकर 

यह सृष्टि जिसमें असंख्य नक्षत्र, आकाशगंगा और निहारिकायें पाई जाती हैं, कैसे उत्पन्न हुई इस प्रश्न पर दार्शनिक और वैज्ञानिक शताब्दियों से विचार करते आ रहे हैं|
       अब कई वैज्ञानिकों का विश्वास है कि इसकी उत्पत्ति किसी बहुत सघन आणविक वस्तु के धमाके से फटने के कारण हुई है| पटाखे की तरह उसने अंदर के पदार्थ को बाहर फेंका जो बाद में सितारे, आकाशगंगा और निहारिकायें बन गई| इस धमाके के सिद्धांत को big-bang-theory कहते हैं| 
           लेकिन एक भारतीय खगोल भौतिकविद जयंत विष्णु नार्लीकर हैं जो इस बात पर विश्वास नहीं करते और उनका कहना है कि यह सिद्धांत अभी प्रमाणित नहीं हुआ है| वास्तव में एक ऐसा समय था जब वह इसके विरोधी सिद्धांत steady-state में विश्वास करते थे|
          इस सिद्धांत के अनुसार सृष्टि भूत, वर्तमान और भविष्य में सदा एक जैसी रहती है| सितारे, आकाशगंगा और अन्य तत्वों के रूप में पदार्थ सारे संसार में बराबर फैला हुआ है| किसी आकाशगंगा तथा अन्य नक्षत्रों की गति से उत्पन्न होने वाले खाली स्थान को भरने के लिए नया पदार्थ बनता रहता है|
           steady-state सिद्धांत पर काम करने के अतिरिक्त जे. वी. नार्लीकर ने अपने अध्यापक फ्रेड हॉयल के साथ मिलकर गुरुत्व के एक नए सिद्धांत पर काम किया| उस समय इनकी आयु केवल 26 वर्ष की थी|
         तब यह सिद्धांत उतना ही महत्वपूर्ण समझा जाता था जितना आइंस्टीन का अपेक्षाता का सिद्धांत| संसार में जे. वी. नार्लीकर को भारत का आइंस्टीन कहा जाता है| 
         जे. वी. नार्लीकर गणितज्ञों के परिवार में से हैं| उनका जन्म कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में 19 जुलाई 1938 में हुआ| लेकिन उनका लालन-पालन वाराणसी में अपने गणितज्ञ चाचा के घर में हुआ |प्रतिदिन सुबह चाचा ब्लैक बोर्ड पर एक गणित की समस्या लिख देते और उसे तब तक ना मिटाया जाता जब तक जयंत उसे हल न कर लेता| उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.एससी. और पी.एच.डी. की| फिर वह कैंब्रिज के किंग्स कॉलेज में फ्रेड हॉयल के अधीन रिसर्च करने गए| खगोल विज्ञान में अपने शोध कार्य के लिए आपको कई पुरस्कार और मेडल मिले| साथ में छात्रवृत्तियां भी मिलीं|
      जे. वी. नार्लीकर सन 1972 में देश लौट आए| तब से वह खगोल विज्ञान के प्रोफेसर के रूप में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में कार्य कर रहे हैं| अब वह अपने छात्रों के साथ टैकीयोन्स पर काम कर रहे हैं जो प्रकाश कणों से भी तेज होते हैं| वह ब्लैक होल्स (कृष्ण विवर) पर भी शोध कार्य कर रहे हैं| ब्लैक होल्स बहुत सिकुड़े हुए खगोलीय पिंड हैं जिनका गुरुत्व बहुत अधिक है| ब्लैक होल के एक चम्मच पदार्थ का भाऱ कई टनों के बराबर होता है| इसलिए यह प्रकाश को भी अपनी सतह से परे नहीं जाने देता| नारलीकर के अनुसार ब्लैक होल टैकीयोन्स का अवशोषण कर लेता है और अपनी सतह का क्षेत्र कम कर सकता है| इसलिए उनका दावा है कि टैकीयोन्स को ढूंढने के लिए ब्लैक होल की खोज करनी चाहिए जो आकार में सिकुड़ते जा रहे हैं|
         नारलीकर विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए बहुत लंबे समय से काम कर रहे हैं और विज्ञान कथाएं (साइंस फिक्शन) भी लिखते हैं|

पुरस्कार-
(1) 1981 मे राष्ट्र भूषण 
(2) 1996 मे यूनेस्को द्वारा कलिंग पुरस्कार 
(3) 2004 मे पद्म भूषण 
(4) 2010 मे महाराष्ट्र भूषण 
(5) 2014 मे साहित्य एकेडमी एवार्ड 
(6) भटनागर एवार्ड 

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

एम. जी. के. मेनन

ममबिलीकलाथिल गोविन्द कुमार मेनन एक विख्यात भौतिक शास्त्री हैं जिन्होंने अपने गुरु तथा नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सी. एफ. पावेल से वैज्ञानिक प्रणाली का सौंदर्य तथा मानव प्रयास के विशद क्षेत्रों में इसके उपयोग का रहस्य समझ लिया था |
            अपने परामर्शदाता होमी जहांगीर भाभा से उन्होंने सीखा कि भारत जैसे देश में भी अगर अच्छी कार्यप्रणाली और संगठन हो और कार्यक्षेत्र का चुनाव सावधानी से किया गया हो तो ऊंचे स्तर का शोध कार्य संभव है| उन्होंने इस देश को इलेक्ट्रॉनिक्स और अंतरिक्ष किरण भौतिकी के क्षेत्र में अन्य अग्रणी देशों के समकक्ष खड़ा कर दिया|
           एक वैज्ञानिक प्रशासक के रूप में उन जैसे व्यक्ति की भारत जैसे विकासशील देश को बहुत आवश्यकता है|
            मेनन का जन्म 28 अगस्त सन 1928 में कर्नाटक के मंगलौर जिले में एक डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज के घर में हुआ| मूल शिक्षा देश के विभिन्न भागों में मिली| इसके पश्चात 1941 में उन्होंने ब्रिस्टल विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया| वहां उन्होंने सी. एफ. पावेल के अधीन शोध कार्य किया| और कुछ मूल कणों की खोज की| उनमें  विभिन्न ऊर्जाओं के कण और विशेष वर्ग के पियोन्स थे|
                सन 1955 में वह देश वापस लौटे और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में काम करने लगे| यहां रहकर उन्होंने भारत में बहुत ऊंचाई पर भू चुंबकीय भूमध्य रेखा के निकट और कोलार में सोने की खानों में बहुत गहराई पर अंतरिक्ष किरणों के बारे में अध्ययन किया|
             मेनन को कई बार सम्मानित किया गया और कई पुरस्कार मिले| सन 1960 में उन्हें एस.एस. भटनागर अवार्ड मिला और 1970 में वह रॉयल सोसाइटी के सदस्य चुने गए| अनुसंधान के अतिरिक्त उन्हें  चित्रकला, बागवानी और मूर्तिकला से बहुत प्रेम है| सन 1986 के आरंभ में वह प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुए|

सोमवार, 10 अगस्त 2020

शम्भुनाथ डे

                 शम्भुनाथ डे 


विज्ञान के इतिहास में शंभू नाथ डे का उदाहरण प्रतीकात्मक है |जब भी कभी कोई वैज्ञानिक प्रचलित विश्वासों के विरुद्ध कोई नई परिकल्पना या सिद्धांत प्रस्तावित करता है तो समसामयिकों  द्वारा उसकी उपेक्षा की जाती है| असम्मानित और निरादृत ही वह मृत्यु को प्राप्त होता है| वर्षों बाद जब कोई अन्य वैज्ञानिक उसके विचार या परिकल्पना का निष्पक्ष रुप से परीक्षण करता है तो पता है कि उसकी बात सही थी| जॉर्ज मेंडल के आनुवंशिकता सिद्धांत विज्ञान के इतिहास में इसी प्रकार की एक प्रसिद्ध घटना है| शंभू नाथ डे  के द्वारा हैजा फैलाने वाले जहरीले तत्व की खोज भारत के वैज्ञानिक इतिहास में एक जानी-मानी घटना है| सन 1985 में उनकी मृत्यु होने तक उनके काम को मान्यता प्रदान करना या सम्मानित करना तो दूर, वैज्ञानिक बिरादरी के चंद लोग ही उनकी खोजों के विषय में जानते थे| किंतु उनकी खोज हैजे के अनुसंधान कार्य में पथ प्रदर्शक थी और इस रोग से बचाव तथा इसके नियंत्रण के लिए मुख से दी जाने वाली वैक्सीन इसी खोज की देन थी|

             डे का जन्म कोलकाता से 30 किलोमीटर उत्तर की ओर एक छोटे से गांव गरीबाटी में एक साधारण आय वाले व्यापारी के घर में सन 1915 में हुआ| गरीबाटी में स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद वे चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन के लिए कोलकाता गए | उन्हें उच्चतर शिक्षा के लिए छात्रवृत्तियां अवश्य मिलीं  किंतु यह धन उनकी जरूरतों के लिए काफी नहीं था |उनके मधुर स्वभाव और तीक्ष्ण बुद्धि के कारण कुछ लोगों ने उन्हें अपने घर में टिकाने  का प्रस्ताव रखा| वास्तव में एक प्रोफेसर डे,  जो बाद में उनके ससुर बने आर्थिक और नैतिक रूप से उनकी बहुत सहायता करते रहे| विवाह के बाद डे लंदन विश्वविद्यालय में पीएचडी करने के लिए भेजे गए |

                    डे विदेश तो गए किंतु वहां कोई सार्थक काम नहीं कर पाने के कारण निराशा ही उनके हाथ लगी | अनुसंधान के विषय में वह अवश्य काफी कुछ सीख पाए | अपनी वापसी पर वह आत्मविश्वास से भरे हुए थे क्योंकि उन्हें सुव्यवस्थित रूप से अनुसंधान करने का तरीका मालूम था| वास्तव में हैजे  की समस्या का निराकरण करने का विचार उन्हें लंदन में ही आया था और अनुसंधान के लिए आवश्यक उपकरण डे  अपने साथ लेकर आए थे| नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज में नियुक्ति  पाकर वह हैजे  पर अनुसंधान में जी जान से जुट  गए|

                   बहुत पहले सन 1883 में रॉबर्ट कोच ने हैजे  का कारण एक ऐसा बैक्टीरिया बताया था जो मानव शरीर में भोजन और पानी के माध्यम से प्रवेश करता है| हैजे  को फैलने से रोकने का एक ही तरीका था- साफ सफाई और स्वास्थ्य का ध्यान रखना| हैजे से ग्रस्त व्यक्ति शरीर के तरल पदार्थ और प्राण आधार लवणों को उल्टी और पेचिश में खो देता था और वह गुर्दे के क्षय  तथा रक्तवह- तंत्र के जवाब देने से दर्दनाक मौत मरता था| वास्तव में एशिया, अफ्रीका और यहां तक कि यूरोप का इतिहास भी समय-समय पर सैकड़ों लोगों को मारने वाली हैजे की महामारी से भरा पड़ा है| भारत में भी हैजे की बीमारी स्वास्थ्य की देखरेख न करने और गंदगी के कारण आम थी| अपने देशवासियों के लिए अभिशाप बने हैजे पर डे ने अनुसंधान कार्य शुरू किया और उसके कारण को खोज निकाला| आरंभ में उन्होंने एक सरल सी किंतु नई तकनीक खोज निकाली जो हैजे  से ग्रस्त व्यक्तियों के रोग लक्षणों को खरगोशों में दर्शाती  थी|

          इसके बाद क्रमबद्ध अन्वेषण से उन्होंने जाना कि हैजा  किसी जीवाणु के द्वारा नहीं बल्कि जहरीले तत्व 'एन्टेरोक्सिन ' से होता है जिसका रिसाव मानव के पाचक - क्षेत्र में पाई जाने वाली परिस्थितियों में होता है| सन 1959 में प्रतिष्ठित ब्रिटिश वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में इनकी खोज का समाचार प्रकाशित हुआ था जो कि अगले 5 वर्ष तक किसी ने उनकी खोज खबर नहीं ली| आज इसे सारे विश्व में हैजे से संबंधित खोज की आधारशिला माना जाता है|

      अध्यापन के भारी कार्य और मान्यता से विहीन  प्रशासकीय कार्य के साथ डे  ने न्यूनतम सुविधाओं, उपकरणों और धन से ही कोलकाता मेडिकल कॉलेज में अपना अनुसंधान जारी रखा |अक्सर शाम को कॉलेज बंद होने के बाद वह अपने पैसे खर्च करके अनुसंधान कार्य करते थे| कभी भी किसी सत्ताधारी से उन्होंने धन  या सुविधाओं की याचना नहीं की| मृदुभाषी और विनम्र डे  के थोड़े से मित्र और हितैषी थे, और अनुसंधान कार्य को शौक के रूप में उन्होंने मृत्यु- पर्यंत जारी रखा | एक घटना अवश्य हुई जिससे उन्हें हर्ष हुआ होगा| यह थी नोबेल फाउंडेशन द्वारा सन 1978 में हैजे  पर विचार गोष्ठी आयोजित करना और उस में भाग लेने के लिए उनसे प्रार्थना करना| सन साठ  के दशक में उनकी खोज को पश्चिम में मान्यता मिली और जहरीले तत्व की रासायनिक विशेषता को समझने का भी प्रयास होने लगा| साथ ही आणविक स्तर पर इसकी कार्यविधि समझने का भी प्रयत्न होने लगा जो इस बीमारी का निराकरण करने वाली वैक्सीन बनाने में आवश्यक था|








बुधवार, 29 जुलाई 2020

राजा रामन्ना

                    राजा रामन्ना
18 मई सन 1974 में भारत ने प्रथम परमाणु परीक्षण राजस्थान के पोखरण रेगिस्तान में किया| इस उपलब्धि का श्रेय राजा रामन्ना, उनके साथियों एवं आभा को है, जिन्होंने भारत के परमाणु कार्यक्रम की आधारशिला रखी थी| यह रामन्ना की प्रथम सफलता नहीं थी| देश के प्रथम परमाणु रिएक्टरों, अप्सरा, सिरस और पूर्णिमा की रूपरेखा और स्थापना में उनकी भूमिका मुख्य थी|
            रामन्ना का जन्म 28 जनवरी 1925 को तिपतुर, मैसूर में  हुआ था और उनकी आरंभिक शिक्षा बंगलुरु में हुई| उन्होंने पीएचडी की डिग्री लंदन विश्वविद्यालय से ली | सन 1949 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में प्रोफेसर के पद पर काम करने लगे |बाद में बाबा परमाणु अनुसंधान केंद्र में भौतिकी विभाग के प्रधान बने| सन 1966 में भाभा के स्वर्गवास के पश्चात उन्होंने देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ाने का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया |
               पोखरण परमाणु परीक्षण रामन्ना का ही विचार था| नहरे और बड़े बड़े तालाब खोदने बांध और बंदरगाहों के लिए जमीन साफ और समतल करने का काम एवं आणविक अवशिष्ठ के लिए जमीन के भीतर भंडार घर बनाने के लिए प्रायः  बारूद से काम लिया जाता है |ऐसे कामों के लिए आणविक शक्ति इस्तेमाल नहीं की जाती क्योंकि इसका धमाका बड़े जोर का होता है और हानिकारक रेडियोएक्टिव किरणें गिरती है| रामन्ना ने जमीन के नीचे परमाणु परीक्षण करना चाहा| वह देखना चाहते थे कि वह डायनामाइट के बदले कैसा काम करेगा| उनके अनुमान के अनुसार परीक्षण से यह स्पष्ट हो गया कि परमाणु ऊर्जा को बिना किसी हानिकारक प्रभाव के नियंत्रित किया जा सकता है और इसे आदमी के भले के लिए उपयोग किया जा सकता है| इसके अतिरिक्त यह डायनामाइट से सस्ता भी होगा| अणुशक्ति के शांतिपूर्ण उपयोग की दिशा में यह परीक्षण एक बहुत बड़ा कदम था|
               रामन्ना का मूलभूत योगदान नाभिकीय विखंडन के क्षेत्र में है| उन्होंने एक नया सिद्धांत पेश किया जो यह बताता था कि भारी केंद्रक कैसे विभाजित होकर उग्र आणविक विकिरण देते हैं| परमाणु भौतिकी के अतिरिक्त उन्हें भारत के प्राचीन दर्शन में बहुत दिलचस्पी है|
                 रामन्ना सन 1997 - 2003 तक राज्यसभा के सदस्य भी नामित किये गए | इनकी मृत्यु 24 सितम्बर 2004 को मुंबई, महाराष्ट्र में हो गयी |


अवार्ड -
* 1963 में शांति स्वरुप भटनागर अवार्ड फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी 

* 1968 में पद्मश्री 
* 1973 में पद्म भूषण  
* 1975 में पद्म विभूषण 














रविवार, 19 जुलाई 2020

श्रीनिवास रामानुजन

               श्रीनिवास रामानुजन


गणित की कक्षा चल रही थी |अध्यापक सिखा रहे थे | श्यामपट्ट पर तीन केले बने हुए थे |"हमारे पास तीन केले हैं," अध्यापक ने कहा," और तीन ही लड़के हैं| क्या तुम बता सकते हो कि प्रत्येक लड़के  को कितने केले मिलेंगे?"
             अगली पंक्ति में बैठे एक होशियार लड़के ने उत्तर दिया," प्रत्येक लड़के को एक केला मिलेगा|"
            अध्यापक ने कहा," तुमने ठीक कहा|इसी तरह यदि 1000 केले हों और 1000 लड़कों में बांटे जाएं तो भी प्रत्येक लड़के को एक ही केला मिलेगा क्यों ठीक है ना?"
             जब अध्यापक समझा रहे थे तो कोने में बैठे एक लड़के ने हाथ ऊपर उठाया और खड़ा हो गया| अध्यापक रुक गया और लड़के के बोलने की प्रतीक्षा करने लगा |लड़का बोला," जनाब यदि कोई केला किसी में ना बांटा  जाए तो क्या तब भी प्रत्येक को एक केला मिलेगा|" कक्षा में सब हंस पड़े "क्या मूर्खता का प्रश्न है?"
               अध्यापक ने जोर से मेज पर हाथ मारा और कहा," चुप हो जाओ इसमें हंसने की कोई बात नहीं है मैं समझाता हूं कि वह क्या कहना चाहता है| हमने केलों के बंटवारे में तीन को 3 से भाग किया फिर कहा कि प्रत्येक को एक केला मिलेगा| फिर हमने 1000 को 1000 से भाग दिया तब भी सबको एक केला मिला| वह पूछना चाहता है यदि शून्य  केले को शून्य  में बांटा जाए तो क्या तब भी प्रत्येक लड़के को एक केला मिलेगा| इसका उत्तर है 'नहीं'| गणित के अनुसार प्रत्येक को असंख्य  केले मिलेंगे|"
              लड़के फिर हंस पड़े| वह गणित के करतब को समझ कर हंसे थे लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आया कि बाद में अध्यापक ने उस लड़की की जिसने ऐसा बेकार सा प्रश्न पूछा था प्रशंसा क्यों की | लड़के ने ऐसा प्रश्न पूछा था जिसका उत्तर देने में गणितज्ञों को शताब्दीया लग गई| कुछ गणितज्ञों का कहना था कि शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य  आता है| लेकिन अन्य कहते थे कि यह एक होता है| जिस लड़के ने यह  उलझन भरा प्रश्न पूछा था उसका नाम था श्रीनिवास रामानुजन| अपने पूरे जीवन में, चाहे अपने जन्मस्थान कुंबकोणम में रहे या विदेश के कैंब्रिज में वह सदा अपने गणित के अध्यापकों से आगे रहते|
                 रामानुजन का जन्म तमिलनाडु के इरोद नामक स्थान पर 22 दिसंबर 1887 में हुआ| उनके पिता कपड़े की एक दुकान में मुनीम थे| बचपन से ही यह स्पष्ट था कि रामानुजन विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं| वरिष्ठ छात्र उनसे गणित के प्रश्न हल करवाने उनके छोटे से मकान में आते| 13 वर्ष की आयु में रामानुजन एक कॉलेज लाइब्रेरी से लोनी की त्रिकोणमिति की पुस्तक ले आए| उन्होंने न सिर्फ इस कठिन पुस्तक को पढ़ा और समझा, बल्कि अपना शोध कार्य भी आरंभ कर दिया| उन्होंने उन कई प्रमेय और फार्मूला का पता लगाया जो पुस्तक में दिए नहीं गए थे, यद्यपि उनकी खोज पहले के प्रसिद्ध गणितज्ञों  ने की थी|
                 एक सबसे महत्वपूर्ण बात 2 वर्ष बाद हुई जब उनके एक वरिष्ठ मित्र ने उन्हें जॉर्ज शूब्रिज कार की 'सिनॉप्सिस आफ एलिमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड अप्लाइड मैथमेटिक्स' दिखाई| 15 वर्ष के लड़के के लिए यह शीर्षक ही डरा  देने वाला होना चाहिए था| मगर रामानुजन इसे पाकर बहुत प्रसन्न हुए| वह पुस्तक को घर ले गए और उसमें दिए प्रश्नों को सुलझाने में लग गए| इस पुस्तक ने उनकी गणित की प्रतिभा को प्रेरित किया| गणित के बारे में उनके मस्तिष्क में इस तेजी से विचार आने लगे कि उन सबको लिखना भी कठिन हो गया| वह प्रश्नों को खुले पन्नों में या स्लेट पर  करते और परिणाम नोटबुक में लिखते | विदेश जाने से पहले उन्होंने तीन नोटबुके भर  डाली थीं,  जो बाद में रामानुजन की 'फ्रेयड नोटबुक्स' के नाम से प्रसिद्ध हुई| आज कल भी गणितज्ञ उनका अध्ययन कर रहे हैं जिससे उसमें दिए परिणामों को प्रमाणित या उनका खंडन कर सकें|
                यद्यपि दसवीं की परीक्षा में रामानुजन गणित में प्रथम श्रेणी में पास हुए और उन्हें सुब्रमण्यन छात्रवृत्ति भी मिली| लेकिन कॉलेज में आर्ट्स प्रथम वर्ष में ही 2 बार असफल हुए क्योंकि उन्होंने इतिहास, अंग्रेजी और शरीर विज्ञान पर ध्यान नहीं दिया था| उनके पिता को बड़ी निराशा हुई जब उन्होंने उन्होंने देखा कि रामानुजन सारा समय संख्याएं लिखते रहते हैं और कुछ नहीं करते| उन्होंने सोचा कि रामानुजन पागल हो गया है| उसका पागलपन हटाने के लिए उन्होंने जबरदस्ती बेटे का विवाह कर दिया| उनकी पत्नी के रूप में 8 वर्ष की बालिका जानकी को चुना| अब रामानुजन नौकरी की फिराक में रहने लगे| उन्हें केवल रोटी के लिए ही रुपया नहीं चाहिए था, गणित के प्रश्न हल करने के लिए कागजों के लिए भी पैसा चाहिए था| हर महीने उन्हें 2000 कागज चाहिए होते थे| रामानुजन सड़क पर पड़े कागज के टुकड़ों का भी प्रयोग करने लगे| कभी कभी तो उसी कागज पर जिस पर पहले नीले से लिखा होता, लाल स्याही से लिखने लगते| मैंले और बिखरे बालों के साथ वह  दफ्तरों में जाते और कहते थे कि उन्हें गणित आता है और वह क्लर्क का काम कर सकते हैं| वह अपनी फ़टी  पुरानी कॉपी दिखाते  लेकिन कोई भी कॉपियों में क्या लिखा है समझ नहीं पाता था और उनका प्रार्थना पत्र अस्वीकार कर दिया जाता|

                सौभाग्य से उन्हें एक बार ऐसा व्यक्ति मिला जो उनकी नोटबुक से बड़ा प्रभावित हुआ|वह  व्यक्ति मद्रास पोर्ट ट्रस्ट का निदेशक फ्रांसिस स्प्रिंग  था| उसने ₹25 प्रति माह के वेतन पर रख लिया| इसके बाद कुछ अध्यापक और शिक्षा शास्त्री भी रामानुजन के काम में दिलचस्पी लेने लगे और उन्होंने उनको शोध शिक्षावृत्ति  दिलाने का प्रयास किया| 1 मई 1913 को मद्रास विश्वविद्यालय ने रामानुजन को ₹75 की शिक्षावृत्ति दे दी यद्यपि उनके पास कोई डिग्री नहीं थी|
                  कुछ महीने पहले रामानुजन ने कैंब्रिज के प्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी  को पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने 120 प्रमेय और फार्मूले भेजे थे| उन्हीं में वह भी था जिसे रेमान श्रृंखला के नाम से जाना जाता है| यह  विषय डेफिनेट  इंटीग्रल कैलकुलस का है लेकिन उन्हें पता नहीं था कि जर्मन गणितज्ञ जार्ज एफ .रेमान पहले ही यह श्रृंखला  बना चुके थे| यह  एक दुर्लभ उपलब्धि थी| पत्र में उस  किस्म की इक्वेशनों  के बारे में रामानुजन के अनुमान भी थे जिन्हें मॉडलर कहते हैं| पिअरी डैलने  ने हाल में ही उनके अनुमान को सही प्रमाणित कर दिया है| रामानुजन ने एक हाइपर जियोमेट्रिक श्रृंखला में एक फार्मूला भी दिया जो बाद में उनके नाम से विख्यात हुआ|
       हार्डी और उसके साथी जे.ई .लिटलवुड  को जानने में ज्यादा देर नहीं लगी कि  रामानुजन गणित में दुर्लभ प्रतिभा संपन्न है| उन्होंने रामानुजन के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय आने और ठहरने का प्रबंध कर दिया| और वह 17 मई 1915 को पानी के जहाज द्वारा ब्रिटेन के लिए रवाना हुए|
                 कैंब्रिज में रामानुजन ने अपने आपको अजनबी पाया| कड़ी सर्दी सहना कठिन था और वह ब्राह्मण और शाकाहारी होने के कारण अपना भोजन स्वयं पकाते थे| फिर भी दृढ़ निश्चय  होकर वह गणित में अपना शोध कार्य करते रहे| हार्डी  और लिटिलवुड  की संगति में वह अपनी कठिनाइयों को भूल जाते थे|
        रामानुजन में हार्डी को एक और व्यवस्थित गणितज्ञ मिला| ऐसा जो पाइथागोरस थ्योरम तो जानता हो  मगर  कोनगुरंट  त्रिकोण का उसे पता ना हो| उनके शोध में कई गलतियां इनकी औपचारिक शिक्षा पूरी ना होने के कारण थी| रामानुजन अंकों  से ऐसे खेलते थे जैसे बच्चा अपने खिलौने से खेलते हैं| यह उनकी शुद्ध  प्रतिभा ही थी जो उन्हें गणित की सच्चाई पर पहुंचा देती थी| उन्हें प्रमाणित करना भी विज्ञान में जरूरी है और वह कार्य उन्होंने अपने से कम प्रतिभाशाली लोगों पर छोड़ दिया|

              28 फरवरी 1998 को उन्हें  रॉयल सोसाइटी का सदस्य चुन लिया गया |वह  दूसरे भारतीय थे जिन्हें इस विशिष्ट सदस्यता का सम्मान मिला था| अक्टूबर में ट्रिनिटी कॉलेज कैंब्रिज के सदस्य बने|वह  पहले भारतीय थे जिन्हें यह सम्मान मिला| कैंब्रिज में उनकी उपलब्धि थी हार्डी- रामानुजन लिटलवुड सर्किल मेथड इन नंबर थ्योरी , रोजर - रामानुजन आईडेंटिटी इन पार्टीशन ऑफ़ इंटिगर्स ,सर्वोच्च (हाईएस्ट) कंपोजिट नंबरों की एक लंबी सूची इसके अतिरिक्त उन्होंने बीजगणित  में अंक सिद्धांत और असमता का बीजगणित  पर भी काम किया| बीजगणित में वितित भिन्न( कंटिन्यूड फ्रेक्शंस) पर उनके कार्य को गणितज्ञ लियोनार्ड यूलर और जेकोबी  की बराबरी पर रखा जाता है|
            जब रामानुजन अपना शोध कार्य कर रहे थे, तपेदिक- तब इस बीमारी का इलाज नहीं था उन्हें खा रहा था| रामानुजन को वापस भारत भेज दिया गया| जब वह जहाज से उतरे तो उनके मित्रों ने उन्हें पीला, थका हुआ और कमजोर पाया| अपनी बीमारी के दर्द को भूलने के लिए वह मृत्यु निकट होने पर भी अंको से खेलते रहे|
           26 अप्रैल 1920 को चेटपेट मद्रास में उनकी मृत्यु हो गई|
              गणितज्ञ होने के साथ-साथ रामानुजन प्रसिद्ध ज्योतिषी और अच्छे वक्ता भी थे| वह 'भगवान, शून्य अनंत' जैसे विषयों पर भाषण देते थे|



सोमवार, 13 जुलाई 2020

सालिम अली

                सालिम अली

एक धमाका! एक पक्षी कुछ क्षण तक फड़फड़ाया और फिर जमीन पर गिर पड़ा| एक 10 वर्षीय चश्माधारी बालक जिसने पक्षी पर गोली चलाई थी, भाग कर आया और उसे उठा लिया| पक्षी गौरैया चिड़िया जैसा लगता था मगर यह देखकर बालक को आश्चर्य हुआ कि उसके गले पर पीला धब्बा था| दुविधा में पड़कर बालक उस पक्षी को अपने चाचा अमीरुद्दीन तैयबजी जो खूंखार जानवरों के शिकारी थे, के पास ले गया और पूछा कि यह  किस किस्म की चिड़िया है? उसके चाचा इस बारे में कुछ नहीं जानते थे| लेकिन वह बालक को बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के ऑफिस में ले गए-- अपोलो स्ट्रीट पर एक बड़े भवन में एक छोटा सा कमरा| लड़के का परिचय डब्लू. एस. मिलार्ड  से, जो सोसाइटी के अवैतनिक सचिव थे, से कराया गया |
     मिलार्ड को यह  देखकर आश्चर्य हुआ कि एक भारतीय लड़का पूछ रहा है कि उसने कौन सी है चिड़िया मारी है |वह उसे उस कमरे में ले गए जहां तरह तरह के मरे हुए पक्षियों के शरीरों में भूसा भरकर रखा  हुआ था| एक के बाद दूसरे दराज खोले गए और तरह तरह की चिड़िया दिखाई गई |लड़के ने शायद यह  कल्पना भी नहीं की थी कि पक्षी भी इतने प्रकार की होते हैं|

            वह आश्चर्यचकित देखता रहा जब मिलार्ड ने एक दराज खोला  जिसमें तरह-तरह की गौरैया रखी थी| सावधानी से देखकर मिलार्ड ने एक मरा हुआ पक्षी उठाया| वह पक्षी बिल्कुल वैसा ही था जैसा बालक अपने साथ लाया था| यह एक नर बया  पक्षी था| वह केवल वर्षा ऋतु में ही पहचाना जा सकता है जब उसके गले पर पीला धब्बा उभर आता है|
             लड़के  ने विस्मित होकर कहा मिलार्ड अंकल, मुझे नहीं पता था कि इतनी तरह के पक्षी होते हैं| मैं उनके बारे में सीखना चाहता हूं| मिलार्ड ने मुस्कुराकर सिर हिलाया|उन्होंने अब तक पक्षियों के बारे में जानने के लिए किसी वयस्क में भी विशेष उत्साह नहीं देखा था| उसके पश्चात वह बालक प्रायः  वहां आने लगा| वह सीखने लगा कि पक्षियों को कैसे पहचाना जाता है |बड़े पक्षी को सुरक्षित रखने के लिए उनके शरीर को कैसे भरा जाता है|

      इस बालक का नाम था सलीम मोइजुद्दीन अब्दुल अली जिन्हें सारा संसार असाधारण पक्षी प्रेमी सालिम अली के नाम से जानता है| उनका जन्म 12 नवंबर सन 1896 में हुआ था| अपनी उम्र के नवें दशक में पहुंचकर भी पक्षियों में उनकी रुचि वैसे ही है जैसे तब थी जब वह पहले पहल मिलार्ड  से मिले थे| उन्होंने पक्षियों के संरक्षण के लिए जो योगदान दिया है उसके लिए उन्हें जे. पाल  गेटी वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन प्राइज मिला है|उन्हें कई राष्ट्रीय सम्मान और पुरस्कार भी मिल चुके हैं|
          आश्चर्य की बात यह है कि सालिम अली के पास किसी विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं है| यद्यपि उन्होंने कालेज में प्रवेश लिया था मगर बीजगणित और लोगरिथम से डर कर पढ़ाई छोड़कर भाग खड़े हुए| वह अपने भाई की वुल्फ्रेम माइनिंग में मदद करने वर्मा चले गए लेकिन यहां भी यह असफल रहे| यह वर्मा के जंगलों में वुल्फ्रेम के बदले पक्षियों की खोज करने लगे|
            घर लौटने पर उन्होंने प्राणी शास्त्र में एक कोर्स कर लिया और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के अजायबघर में गाइड नियुक्त हो गए| वह पक्षियों की चमड़ी उतारने और उन्हें भरने की उच्च प्रशिक्षण लेने के लिए जर्मनी गए| 1 वर्ष बाद लौटने पर उन्होंने पाया कि उनकी नौकरी चली गई है और वह बेकार हो गए हैं| पैसे की कमी के कारण उनकी अनुपस्थिति में उनका पद ही समाप्त कर दिया गया था|

           सालिम अली विवाहित थे और काम की सख्त जरूरत थी| लेकिन उन्हें ज्यादा से ज्यादा क्लर्क का काम मिलने की उम्मीद थी और उसके बाद उन्हें अपने मनचाहे काम बर्डवाचिंग के लिए अधिक समय नहीं मिल सकता था|
               सौभाग्य से उनकी पत्नी की कुछ निजी आय थी जिससे इन्हें बहुत सहारा मिला| उन्होंने बंदरगाह के पार किहिम  में एक छोटा सा घर ले लिया|
             यह  घर पेड़ों के बीच बना हुआ था और वहां बड़ी शांति थी| जब वर्षा ऋतु आई तो सालिम अली ने देखा कि घर के पास ही बयां पक्षियों ने एक पेड़ पर अपनी बस्ती बनाई है| तब तक बया पक्षी के बारे में लोगों को कुछ ज्यादा जानकारी नहीं थी| इन पक्षियों का अध्ययन करने का सालिम अली के लिए यह सुनहरा अवसर था| तीन चार महीने तक वह रोज घंटों बैठे बड़े धैर्य से इन पक्षियों को वहां कार्यरत देखते रहे| सन् 1930 में इस अध्ययन के परिणाम को प्रकाशित किया तो उन्हें पक्षी विज्ञान (ओर्निथोलॉजी) में खूब ख्याति मिली|

              जो महीने उन्होंने बया पक्षियों का अध्ययन करते हुए बिताए थे उससे उन्हें स्वयं परीक्षण और प्रेक्षण का महत्व समझ में आया|और यह भी जान गए कि आंखें बंद करके किसी की बात को चाहे वह कितनी भी प्रसिद्ध व्यक्ति ने क्यों ना कही  हो स्वीकार नहीं करना चाहिए| वह अपने पर्यवेक्षण के परिणामों को बार बार जांचते  थे और जल्दी किसी परिणाम पर नहीं पहुंचते थे| इससे इनके विचारों और राय को अधिकारिक माना जाने लगा है, और इसी कारण कई बार उनका टकराव वरिष्ठ पक्षी प्रेमियों से हुआ|

          इसका प्रसिद्ध उदाहरण है रैकेट टेल्ड ड्रॉन्गो में दुम के परो  का निकलना| एक प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी ने कहा कि सालिम अली का परीक्षण गलत है, लेकिन फिर अंततः सालिम अली ही ठीक निकले| उनकी फिन बयां की खोज भी महत्वपूर्ण योगदान है |समझा जाता था  कि 100 वर्ष से वह पक्षी विलुप्त हो गया है मगर सालिम अली ने कुमायूं की पहाड़ियों में उसे खोज निकाला|

              अपने बचपन में सालिम अली को भारतीय पक्षियों पर एक अच्छी पुस्तक की कमी बहुत खलती थी| जो कुछ पुस्तकें उपलब्ध थी उनमें चित्र ही नहीं थे और इनमें केवल उकता देने वाला विस्तृत वर्णन था| ऐसी पुस्तकें किसी का पक्षियों के प्रति उत्साह बढ़ाने के स्थान पर उसे बिल्कुल खत्म कर देती हैं, विशेषकर बच्चों में| सन 1941 में उन्होंने यह कमी पूरी करने की कोशिश की और बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स लिखी| उसमें सुंदर वर्णन भी था और प्रत्येक जाति का सुंदर चित्र भी | किसी अजनबी के लिए भी उसे देखकर पक्षी पहचानना आसान हो गया| सन 1948 में उन्होंने प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी एस.  डिलन रीप्ले के साथ एक अन्य महत्वाकांक्षी योजना पर काम आरंभ किया| दोनों ने 10 खंडों में एक पुस्तक लिखी "हैंडबुक ऑफ़ द बर्ड्स ऑफ़ इंडिया एंड पाकिस्तान"| इस पुस्तक में इस उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले सभी पक्षियों के बारे में जानकारी है| उनकी आकृति, वे कहाँ मिलते हैं, उनकी प्रजनन की आदतें, प्रवजन (माइग्रेशन) और यह भी कि उनके बारे में और क्या जानना बाकी है|
               सालिम अली बर्ड वाचिंग के लिए सारे देश में घूमे हैं| कहा जाता है कि देश का ऐसा कोई कोना नहीं जहां उन्होंने अपने रबर के भारी जूतों के चिन्ह ना छोड़े हैं|

               सन 1987 में सालिम अली की मृत्यु हो गई| इन्हें "बर्ड मैन ऑफ इंडिया" कहा जाता है|