The aim of this blog is providing the information about the Indian scientist. By the help of these blog posts we know about the contribution and help which is provided by the Indian scientist to the all living beings included human being.
मंगलवार, 25 अगस्त 2020
एम. जी. के. मेनन
सोमवार, 10 अगस्त 2020
शम्भुनाथ डे
शम्भुनाथ डे
विज्ञान के इतिहास में शंभू नाथ डे का उदाहरण प्रतीकात्मक है |जब भी कभी कोई वैज्ञानिक प्रचलित विश्वासों के विरुद्ध कोई नई परिकल्पना या सिद्धांत प्रस्तावित करता है तो समसामयिकों द्वारा उसकी उपेक्षा की जाती है| असम्मानित और निरादृत ही वह मृत्यु को प्राप्त होता है| वर्षों बाद जब कोई अन्य वैज्ञानिक उसके विचार या परिकल्पना का निष्पक्ष रुप से परीक्षण करता है तो पता है कि उसकी बात सही थी| जॉर्ज मेंडल के आनुवंशिकता सिद्धांत विज्ञान के इतिहास में इसी प्रकार की एक प्रसिद्ध घटना है| शंभू नाथ डे के द्वारा हैजा फैलाने वाले जहरीले तत्व की खोज भारत के वैज्ञानिक इतिहास में एक जानी-मानी घटना है| सन 1985 में उनकी मृत्यु होने तक उनके काम को मान्यता प्रदान करना या सम्मानित करना तो दूर, वैज्ञानिक बिरादरी के चंद लोग ही उनकी खोजों के विषय में जानते थे| किंतु उनकी खोज हैजे के अनुसंधान कार्य में पथ प्रदर्शक थी और इस रोग से बचाव तथा इसके नियंत्रण के लिए मुख से दी जाने वाली वैक्सीन इसी खोज की देन थी|
डे का जन्म कोलकाता से 30 किलोमीटर उत्तर की ओर एक छोटे से गांव गरीबाटी में एक साधारण आय वाले व्यापारी के घर में सन 1915 में हुआ| गरीबाटी में स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद वे चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन के लिए कोलकाता गए | उन्हें उच्चतर शिक्षा के लिए छात्रवृत्तियां अवश्य मिलीं किंतु यह धन उनकी जरूरतों के लिए काफी नहीं था |उनके मधुर स्वभाव और तीक्ष्ण बुद्धि के कारण कुछ लोगों ने उन्हें अपने घर में टिकाने का प्रस्ताव रखा| वास्तव में एक प्रोफेसर डे, जो बाद में उनके ससुर बने आर्थिक और नैतिक रूप से उनकी बहुत सहायता करते रहे| विवाह के बाद डे लंदन विश्वविद्यालय में पीएचडी करने के लिए भेजे गए |
डे विदेश तो गए किंतु वहां कोई सार्थक काम नहीं कर पाने के कारण निराशा ही उनके हाथ लगी | अनुसंधान के विषय में वह अवश्य काफी कुछ सीख पाए | अपनी वापसी पर वह आत्मविश्वास से भरे हुए थे क्योंकि उन्हें सुव्यवस्थित रूप से अनुसंधान करने का तरीका मालूम था| वास्तव में हैजे की समस्या का निराकरण करने का विचार उन्हें लंदन में ही आया था और अनुसंधान के लिए आवश्यक उपकरण डे अपने साथ लेकर आए थे| नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज में नियुक्ति पाकर वह हैजे पर अनुसंधान में जी जान से जुट गए|
बहुत पहले सन 1883 में रॉबर्ट कोच ने हैजे का कारण एक ऐसा बैक्टीरिया बताया था जो मानव शरीर में भोजन और पानी के माध्यम से प्रवेश करता है| हैजे को फैलने से रोकने का एक ही तरीका था- साफ सफाई और स्वास्थ्य का ध्यान रखना| हैजे से ग्रस्त व्यक्ति शरीर के तरल पदार्थ और प्राण आधार लवणों को उल्टी और पेचिश में खो देता था और वह गुर्दे के क्षय तथा रक्तवह- तंत्र के जवाब देने से दर्दनाक मौत मरता था| वास्तव में एशिया, अफ्रीका और यहां तक कि यूरोप का इतिहास भी समय-समय पर सैकड़ों लोगों को मारने वाली हैजे की महामारी से भरा पड़ा है| भारत में भी हैजे की बीमारी स्वास्थ्य की देखरेख न करने और गंदगी के कारण आम थी| अपने देशवासियों के लिए अभिशाप बने हैजे पर डे ने अनुसंधान कार्य शुरू किया और उसके कारण को खोज निकाला| आरंभ में उन्होंने एक सरल सी किंतु नई तकनीक खोज निकाली जो हैजे से ग्रस्त व्यक्तियों के रोग लक्षणों को खरगोशों में दर्शाती थी|
इसके बाद क्रमबद्ध अन्वेषण से उन्होंने जाना कि हैजा किसी जीवाणु के द्वारा नहीं बल्कि जहरीले तत्व 'एन्टेरोक्सिन ' से होता है जिसका रिसाव मानव के पाचक - क्षेत्र में पाई जाने वाली परिस्थितियों में होता है| सन 1959 में प्रतिष्ठित ब्रिटिश वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में इनकी खोज का समाचार प्रकाशित हुआ था जो कि अगले 5 वर्ष तक किसी ने उनकी खोज खबर नहीं ली| आज इसे सारे विश्व में हैजे से संबंधित खोज की आधारशिला माना जाता है|
अध्यापन के भारी कार्य और मान्यता से विहीन प्रशासकीय कार्य के साथ डे ने न्यूनतम सुविधाओं, उपकरणों और धन से ही कोलकाता मेडिकल कॉलेज में अपना अनुसंधान जारी रखा |अक्सर शाम को कॉलेज बंद होने के बाद वह अपने पैसे खर्च करके अनुसंधान कार्य करते थे| कभी भी किसी सत्ताधारी से उन्होंने धन या सुविधाओं की याचना नहीं की| मृदुभाषी और विनम्र डे के थोड़े से मित्र और हितैषी थे, और अनुसंधान कार्य को शौक के रूप में उन्होंने मृत्यु- पर्यंत जारी रखा | एक घटना अवश्य हुई जिससे उन्हें हर्ष हुआ होगा| यह थी नोबेल फाउंडेशन द्वारा सन 1978 में हैजे पर विचार गोष्ठी आयोजित करना और उस में भाग लेने के लिए उनसे प्रार्थना करना| सन साठ के दशक में उनकी खोज को पश्चिम में मान्यता मिली और जहरीले तत्व की रासायनिक विशेषता को समझने का भी प्रयास होने लगा| साथ ही आणविक स्तर पर इसकी कार्यविधि समझने का भी प्रयत्न होने लगा जो इस बीमारी का निराकरण करने वाली वैक्सीन बनाने में आवश्यक था|