विक्रम ए. साराभाई
1943 में विक्रम साराभाई जो उस समय केवल 23 वर्ष के थे ऊचाई पर अंतरिक्ष किरणों का अध्ययन करने के लिए कश्मीर में हिमालय पर पहुंचे | उन्हें वह स्थान इतना अच्छा लगा कि उन्होंने वहाँ अंतरिक्ष किरणों का अध्ययन करने के लिए प्रयोगशाला खोलने का निश्चय किया |
ब्रिटेन से पी .एच. डी. करके लौटने पर उन्होंने भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला कि नींव अहमदाबाद में रखी | यह संस्था अंतरिक्ष किरणों और बाह्य अंतरिक्ष को समर्पित है | सन 1955 में उन्होंने प्रयोगशाला कि शाखा कश्मीर के गुलमर्ग नामक स्थान में स्थापित की | इसी तरह अन्य केंद्र तिरुअनंतपुरम और कोडाईकनाल में स्थापित की |
साराभाई का जन्म 12 अगस्त सन 1919 में हुआ था और उनका जीवन भी भाभा से बहुत मिलता -जुलता था | उनका परिवार भी धनी था | यदि वह चाहते तो उद्योगपति बन सकते थे | लेकिन उनकी मूल रूचि गणित और भौतिकी में थी | भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला का उद्देश्य वहीं था जो भाभा की संस्था टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च का है | यह संस्था देश को अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए वैज्ञानिक और तकनीक उपलब्ध कराती है |
वास्तव में साराभाई भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ( इसरो ) का विस्तार करके देश को अंतरिक्ष युग में ले गए | आज अंतरिक्ष तकनीक में भारत की जो उपलब्धियां है उसका श्रेय साराभाई को ही है|यद्द्पि अपने परिश्रम का परिणाम देखने के लिए वह जीवित नहीं रहे | उनके द्वारा शुरू की गयीं योजनाओं में एक वह भी थी जिसके अंतर्गत सन 1975 में आर्यभट्ट उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा गया था | सन 1975 - 76 में सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविज़न एक्सपेरिमेंट (साइट ) कार्यक्रम जिसका लक्ष्य 2400 भारतीय गांवों में रहने वाले 50 लाख लोगो तक शिक्षा पहुंचना था , का श्रेय भी उन्ही को जाता है |
एक दृष्टि में साराभाई भाभा से भी एक कदम आगे थे | उन्होंने विभिन्न प्रकार के प्रतिष्ठानों की स्थापना की |
भाभा की तरह उनकी मृत्यु जल्दी हो गयीं , जब वह केवल 52 वर्ष के थे | विज्ञान और समाज की सेवा के लिए उन्हें कई तरह से सम्मानित किया गया एवं अवार्ड भी मिले | अंतराष्ट्रीय एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने चन्द्रमा के सी ऑफ़ सिरिनिटी क्षेत्र में एक क्रेटर का नाम इनके नाम पर रखकर उन्हें सम्मानित किया |
1943 में विक्रम साराभाई जो उस समय केवल 23 वर्ष के थे ऊचाई पर अंतरिक्ष किरणों का अध्ययन करने के लिए कश्मीर में हिमालय पर पहुंचे | उन्हें वह स्थान इतना अच्छा लगा कि उन्होंने वहाँ अंतरिक्ष किरणों का अध्ययन करने के लिए प्रयोगशाला खोलने का निश्चय किया |
ब्रिटेन से पी .एच. डी. करके लौटने पर उन्होंने भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला कि नींव अहमदाबाद में रखी | यह संस्था अंतरिक्ष किरणों और बाह्य अंतरिक्ष को समर्पित है | सन 1955 में उन्होंने प्रयोगशाला कि शाखा कश्मीर के गुलमर्ग नामक स्थान में स्थापित की | इसी तरह अन्य केंद्र तिरुअनंतपुरम और कोडाईकनाल में स्थापित की |
साराभाई का जन्म 12 अगस्त सन 1919 में हुआ था और उनका जीवन भी भाभा से बहुत मिलता -जुलता था | उनका परिवार भी धनी था | यदि वह चाहते तो उद्योगपति बन सकते थे | लेकिन उनकी मूल रूचि गणित और भौतिकी में थी | भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला का उद्देश्य वहीं था जो भाभा की संस्था टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च का है | यह संस्था देश को अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए वैज्ञानिक और तकनीक उपलब्ध कराती है |
वास्तव में साराभाई भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ( इसरो ) का विस्तार करके देश को अंतरिक्ष युग में ले गए | आज अंतरिक्ष तकनीक में भारत की जो उपलब्धियां है उसका श्रेय साराभाई को ही है|यद्द्पि अपने परिश्रम का परिणाम देखने के लिए वह जीवित नहीं रहे | उनके द्वारा शुरू की गयीं योजनाओं में एक वह भी थी जिसके अंतर्गत सन 1975 में आर्यभट्ट उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा गया था | सन 1975 - 76 में सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविज़न एक्सपेरिमेंट (साइट ) कार्यक्रम जिसका लक्ष्य 2400 भारतीय गांवों में रहने वाले 50 लाख लोगो तक शिक्षा पहुंचना था , का श्रेय भी उन्ही को जाता है |
एक दृष्टि में साराभाई भाभा से भी एक कदम आगे थे | उन्होंने विभिन्न प्रकार के प्रतिष्ठानों की स्थापना की |
भाभा की तरह उनकी मृत्यु जल्दी हो गयीं , जब वह केवल 52 वर्ष के थे | विज्ञान और समाज की सेवा के लिए उन्हें कई तरह से सम्मानित किया गया एवं अवार्ड भी मिले | अंतराष्ट्रीय एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने चन्द्रमा के सी ऑफ़ सिरिनिटी क्षेत्र में एक क्रेटर का नाम इनके नाम पर रखकर उन्हें सम्मानित किया |



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