भारतीय वैज्ञानिक : मेघनाद साहा

सोमवार, 6 जुलाई 2020

मेघनाद साहा

                  मेघनाद साहा


 मेघनाद साहा का जन्म 6 अक्टूबर सन 1893 में ढाका जिले के सियोरातली  गांव में हुआ था जो आजकल बांग्लादेश में है| उनके पिता परचून की दुकान करते थे जिससे बड़े परिवार का कठिनता  से पालन पोषण होता था |वह अपने पांचवे बच्चे मेघनाद  से आशा करते थे कि वह बचपन में ही परिवार के लिए कमाने लगेगा |अध्यापकों के कहने पर पिता ने अपने होनहार बेटे मेघनाद  को 11 किलोमीटर दूर एक स्कूल के छात्रावास में अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए भेज दिया|अध्यापकों के अनुसार वह अत्यंत प्रतिभाशाली छात्र था |उनके छात्रावास का खर्चा कोई शुभ आकांक्षी दे रहा था| जब शाह ने छात्रवृत्ति प्राप्त कर ली तो  उन्हें उच्च शिक्षा के लिए ढाका भेज दिया गया |बायकाट के पश्चात उन्हें दूसरे स्कूल में प्रवेश लेना पड़ा |फिर भी वार्षिक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया| इससे उन्हें फिर छात्रवृत्ति मिली और उन्होंने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश किया| यहां पर उन्हें पढ़ाने वाले अध्यापक जे. सी .बोस और पी.सी. रे जैसे सुप्रसिद्ध व्यक्ति थे| उनके साथी भी प्रतिभाशाली एस.एन.बोस और पी.सी.महालनोविस थे जो इन्हीं की तरह प्रसिद्ध वैज्ञानिक बने |

                एम. एससी .  मैं मेघनाद साहा को द्वितीय स्थान मिला |प्रथम स्थान एस.एन.बोस को मिला था| उन्होंने इंडियन फाइनेंस सर्विस में जाने का निश्चय किया जिससे अपने जरूरतमंद परिवार की मदद कर सकें |वैज्ञानिक संसार के सौभाग्य से, उनका स्कूल का बहिष्कार और देशभक्त सुभाष चंद्र बोस और राजेंद्र प्रसाद जैसे व्यक्तियों से संबंध के कारण उन्हें कोई भी सरकारी नौकरी ना मिली | स्वाभाविक था कि वह भौतिकी और गणित में शोध कार्य करने की ओर मुड़े |
                     वह अपनी जीविका बच्चों को ट्यूशन देकर कमाने लगे अपने छात्रों को पढ़ाने के लिए वह साइकिल पर प्रातः और सायं दूर-दूर तक जाते थे |सन 1917 में वह और एस.एन. बोस यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ साइंस जो नया खुला था में  प्राध्यापक नियुक्त किए गए |भौतिकी में उन दिनों ऊष्मागतिकी, सापेक्षतावाद और परमाणु सिद्धांत सबसे नई चीजें थी| शाह ने इन विषयों पर खूब पुस्तकें पढ़ें और उन्हें बहुत अच्छी तरह पढ़ाया भी| पढ़ाने के लिए नोट्स बनाते हुए उनके सामने एस्ट्रोफिजिक्स  की  एक समस्या आई| इस समस्या के हल से वह पूरे संसार में प्रसिद्ध हो गए|
            भौतिकी में हुई नवीनतम प्रगति के  जानकार  साहा ने आयोनाइजेशन फार्मूला सामने रखा जिससे वर्णक्रम रेखाओं की उपस्थिति समझाई जा सकती थी| इस फार्मूले द्वारा खगोलज्ञ को  सूर्य और दूसरे सितारों का तापमान ,दबाव और इनकी भीतरी संरचना का पता लग जाता है|
            तारा भौतिकी के क्षेत्र में या एकदम नई खोज थी |साहा ने जब यह फार्मूला लोगों के सामने रखा उस समय उनकी आयु करीब 25 वर्ष की थी |वैज्ञानिक जगत ने उनके कार्य की प्रशंसा की |एक प्रसिद्ध खगोलज्ञ ने तो यहां तक कहा कि या तारा भौतिकी में 12वीं मुख्य खोज है |
            अपनी खोज के करीब 10 वर्ष बाद सन 1927 में यह  रॉयल  सोसाइटी के सदस्य चुने गए |तब तक देश में उनके और उनके काम के बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते थे |कुछ वैज्ञानिकों ने उनके फार्मूले को झूठा तक कह डाला |उन वैज्ञानिकों ने बड़ा प्रयत्न किया कि वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में शामिल ना हो लेकिन साहा ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें कोई नहीं जीत सकता था| लोग उन्हें एयनशाफटन  कहते थे |यह नाम उन्हें अपने काम में लगे रहने की दृढ़ता के कारण मिला था |उन्होंने कभी परवाह नहीं की कि अन्य लोग उनके बारे में क्या कहते हैं |वह इलाहाबाद में अध्ययन और शोध कार्य में लगे रहे| यहां वह स्पेक्ट्रोस्कोपी में शोध कार्य करने लगे| यह वर्णक्रम और आयन मंडल का अध्ययन है और इससे उनकी विभाग को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली|

                प्राचीन भारतीय इतिहास, भूविज्ञान, पुरातत्व ने भी इन्हें अपनी और आकर्षित किया| उन्होंने शक युग के आरंभ के बारे में अध्ययन किया |कुछ चट्टानों की आयु मापी |बाद में जब वह कोलकाता आ गए तो उन्होंने सूर्य से आती रेडियो तरंगों और रेडियो एक्टिविटी के बारे में शोध कार्य किया|
            जब ऑटोहोन , जिन्हें परमाणु बम का पिता कहा जा सकता है ने सन 1940 में अणु विखंडन तकनीक का पता लगाया तो साहा ने तत्काल इसके महत्व को समझ लिया|उनके कहने पर भारत में कोलकाता विश्वविद्यालय में न्यूक्लियर फिजिक्स का विषय पढ़ाया जाने लगा |सन 1948 में उन्होंने उस संस्था की नींव रखी है जिसे आज साहा इंस्टीट्यूट आफ न्यूक्लियर फिजिक्स कहा जाता है| उन्होंने विदेशों में साइक्लोट्रॉन को कार्य करते देखा था| उन्होंने इस यंत्र को इंस्टिट्यूट में भी लगवाया और सन 1950 में भारत का प्रथम साइक्लोट्रॉन काम करने लगा|
            साहा एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थे| स्वयं गरीबी में पलें  थे इसलिए वह अपने गरीब देशवासियों को नहीं भूले| जब भारत का विभाजन हुआ तो पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) से जो शरणार्थी आए उन्हें बसाने में इन्होंने बड़ा काम किया |उन्हें वह समय भी भूला नहीं था जब बचपन में घर के निकट की नदी में बरसात में बाढ़ आ जाती तो वह राहत  कार्य करते थे| उन्होंने बाढ़ के कारणों का अध्ययन किया और उन्हें नियंत्रित करने के लिए कई नदी घाटी परियोजनाओं के सुझाव दिए और इन से आरंभ हुए रिवर वैली प्रोजेक्ट जैसे दामोदर वैली, भाखड़ा नांगल और हीराकुंड यह परियोजना उस कार्य का परिणाम है जो उन्होंने प्रारंभ किया था|
               साहा बड़े साफ दिल के और निडर व्यक्ति थे| कभी-कभी उन्होंने सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की |उन्हें औद्योगिकरण में पूरा विश्वास था और वह वापस गांव चलो नारे के विरूद्ध थे| उनका कहना था कि इससे गरीबी बीमारी अज्ञानता की समस्या हल नहीं होगी| उन्होंने एक पत्रिका साइंस और कल्चर के नाम से निकाली जिससे वह अपना दृष्टिकोण जनता के सामने रख सकें|
               सन 1952 में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में संसद के लिए चुनाव लड़े और ढेर सारी वोटों से विजय प्राप्त की |
               उनकी मृत्यु 16 फरवरी सन  1956 में  हुई|







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