भारतीय वैज्ञानिक : श्रीनिवास रामानुजन

रविवार, 19 जुलाई 2020

श्रीनिवास रामानुजन

               श्रीनिवास रामानुजन


गणित की कक्षा चल रही थी |अध्यापक सिखा रहे थे | श्यामपट्ट पर तीन केले बने हुए थे |"हमारे पास तीन केले हैं," अध्यापक ने कहा," और तीन ही लड़के हैं| क्या तुम बता सकते हो कि प्रत्येक लड़के  को कितने केले मिलेंगे?"
             अगली पंक्ति में बैठे एक होशियार लड़के ने उत्तर दिया," प्रत्येक लड़के को एक केला मिलेगा|"
            अध्यापक ने कहा," तुमने ठीक कहा|इसी तरह यदि 1000 केले हों और 1000 लड़कों में बांटे जाएं तो भी प्रत्येक लड़के को एक ही केला मिलेगा क्यों ठीक है ना?"
             जब अध्यापक समझा रहे थे तो कोने में बैठे एक लड़के ने हाथ ऊपर उठाया और खड़ा हो गया| अध्यापक रुक गया और लड़के के बोलने की प्रतीक्षा करने लगा |लड़का बोला," जनाब यदि कोई केला किसी में ना बांटा  जाए तो क्या तब भी प्रत्येक को एक केला मिलेगा|" कक्षा में सब हंस पड़े "क्या मूर्खता का प्रश्न है?"
               अध्यापक ने जोर से मेज पर हाथ मारा और कहा," चुप हो जाओ इसमें हंसने की कोई बात नहीं है मैं समझाता हूं कि वह क्या कहना चाहता है| हमने केलों के बंटवारे में तीन को 3 से भाग किया फिर कहा कि प्रत्येक को एक केला मिलेगा| फिर हमने 1000 को 1000 से भाग दिया तब भी सबको एक केला मिला| वह पूछना चाहता है यदि शून्य  केले को शून्य  में बांटा जाए तो क्या तब भी प्रत्येक लड़के को एक केला मिलेगा| इसका उत्तर है 'नहीं'| गणित के अनुसार प्रत्येक को असंख्य  केले मिलेंगे|"
              लड़के फिर हंस पड़े| वह गणित के करतब को समझ कर हंसे थे लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आया कि बाद में अध्यापक ने उस लड़की की जिसने ऐसा बेकार सा प्रश्न पूछा था प्रशंसा क्यों की | लड़के ने ऐसा प्रश्न पूछा था जिसका उत्तर देने में गणितज्ञों को शताब्दीया लग गई| कुछ गणितज्ञों का कहना था कि शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य  आता है| लेकिन अन्य कहते थे कि यह एक होता है| जिस लड़के ने यह  उलझन भरा प्रश्न पूछा था उसका नाम था श्रीनिवास रामानुजन| अपने पूरे जीवन में, चाहे अपने जन्मस्थान कुंबकोणम में रहे या विदेश के कैंब्रिज में वह सदा अपने गणित के अध्यापकों से आगे रहते|
                 रामानुजन का जन्म तमिलनाडु के इरोद नामक स्थान पर 22 दिसंबर 1887 में हुआ| उनके पिता कपड़े की एक दुकान में मुनीम थे| बचपन से ही यह स्पष्ट था कि रामानुजन विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं| वरिष्ठ छात्र उनसे गणित के प्रश्न हल करवाने उनके छोटे से मकान में आते| 13 वर्ष की आयु में रामानुजन एक कॉलेज लाइब्रेरी से लोनी की त्रिकोणमिति की पुस्तक ले आए| उन्होंने न सिर्फ इस कठिन पुस्तक को पढ़ा और समझा, बल्कि अपना शोध कार्य भी आरंभ कर दिया| उन्होंने उन कई प्रमेय और फार्मूला का पता लगाया जो पुस्तक में दिए नहीं गए थे, यद्यपि उनकी खोज पहले के प्रसिद्ध गणितज्ञों  ने की थी|
                 एक सबसे महत्वपूर्ण बात 2 वर्ष बाद हुई जब उनके एक वरिष्ठ मित्र ने उन्हें जॉर्ज शूब्रिज कार की 'सिनॉप्सिस आफ एलिमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड अप्लाइड मैथमेटिक्स' दिखाई| 15 वर्ष के लड़के के लिए यह शीर्षक ही डरा  देने वाला होना चाहिए था| मगर रामानुजन इसे पाकर बहुत प्रसन्न हुए| वह पुस्तक को घर ले गए और उसमें दिए प्रश्नों को सुलझाने में लग गए| इस पुस्तक ने उनकी गणित की प्रतिभा को प्रेरित किया| गणित के बारे में उनके मस्तिष्क में इस तेजी से विचार आने लगे कि उन सबको लिखना भी कठिन हो गया| वह प्रश्नों को खुले पन्नों में या स्लेट पर  करते और परिणाम नोटबुक में लिखते | विदेश जाने से पहले उन्होंने तीन नोटबुके भर  डाली थीं,  जो बाद में रामानुजन की 'फ्रेयड नोटबुक्स' के नाम से प्रसिद्ध हुई| आज कल भी गणितज्ञ उनका अध्ययन कर रहे हैं जिससे उसमें दिए परिणामों को प्रमाणित या उनका खंडन कर सकें|
                यद्यपि दसवीं की परीक्षा में रामानुजन गणित में प्रथम श्रेणी में पास हुए और उन्हें सुब्रमण्यन छात्रवृत्ति भी मिली| लेकिन कॉलेज में आर्ट्स प्रथम वर्ष में ही 2 बार असफल हुए क्योंकि उन्होंने इतिहास, अंग्रेजी और शरीर विज्ञान पर ध्यान नहीं दिया था| उनके पिता को बड़ी निराशा हुई जब उन्होंने उन्होंने देखा कि रामानुजन सारा समय संख्याएं लिखते रहते हैं और कुछ नहीं करते| उन्होंने सोचा कि रामानुजन पागल हो गया है| उसका पागलपन हटाने के लिए उन्होंने जबरदस्ती बेटे का विवाह कर दिया| उनकी पत्नी के रूप में 8 वर्ष की बालिका जानकी को चुना| अब रामानुजन नौकरी की फिराक में रहने लगे| उन्हें केवल रोटी के लिए ही रुपया नहीं चाहिए था, गणित के प्रश्न हल करने के लिए कागजों के लिए भी पैसा चाहिए था| हर महीने उन्हें 2000 कागज चाहिए होते थे| रामानुजन सड़क पर पड़े कागज के टुकड़ों का भी प्रयोग करने लगे| कभी कभी तो उसी कागज पर जिस पर पहले नीले से लिखा होता, लाल स्याही से लिखने लगते| मैंले और बिखरे बालों के साथ वह  दफ्तरों में जाते और कहते थे कि उन्हें गणित आता है और वह क्लर्क का काम कर सकते हैं| वह अपनी फ़टी  पुरानी कॉपी दिखाते  लेकिन कोई भी कॉपियों में क्या लिखा है समझ नहीं पाता था और उनका प्रार्थना पत्र अस्वीकार कर दिया जाता|

                सौभाग्य से उन्हें एक बार ऐसा व्यक्ति मिला जो उनकी नोटबुक से बड़ा प्रभावित हुआ|वह  व्यक्ति मद्रास पोर्ट ट्रस्ट का निदेशक फ्रांसिस स्प्रिंग  था| उसने ₹25 प्रति माह के वेतन पर रख लिया| इसके बाद कुछ अध्यापक और शिक्षा शास्त्री भी रामानुजन के काम में दिलचस्पी लेने लगे और उन्होंने उनको शोध शिक्षावृत्ति  दिलाने का प्रयास किया| 1 मई 1913 को मद्रास विश्वविद्यालय ने रामानुजन को ₹75 की शिक्षावृत्ति दे दी यद्यपि उनके पास कोई डिग्री नहीं थी|
                  कुछ महीने पहले रामानुजन ने कैंब्रिज के प्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी  को पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने 120 प्रमेय और फार्मूले भेजे थे| उन्हीं में वह भी था जिसे रेमान श्रृंखला के नाम से जाना जाता है| यह  विषय डेफिनेट  इंटीग्रल कैलकुलस का है लेकिन उन्हें पता नहीं था कि जर्मन गणितज्ञ जार्ज एफ .रेमान पहले ही यह श्रृंखला  बना चुके थे| यह  एक दुर्लभ उपलब्धि थी| पत्र में उस  किस्म की इक्वेशनों  के बारे में रामानुजन के अनुमान भी थे जिन्हें मॉडलर कहते हैं| पिअरी डैलने  ने हाल में ही उनके अनुमान को सही प्रमाणित कर दिया है| रामानुजन ने एक हाइपर जियोमेट्रिक श्रृंखला में एक फार्मूला भी दिया जो बाद में उनके नाम से विख्यात हुआ|
       हार्डी और उसके साथी जे.ई .लिटलवुड  को जानने में ज्यादा देर नहीं लगी कि  रामानुजन गणित में दुर्लभ प्रतिभा संपन्न है| उन्होंने रामानुजन के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय आने और ठहरने का प्रबंध कर दिया| और वह 17 मई 1915 को पानी के जहाज द्वारा ब्रिटेन के लिए रवाना हुए|
                 कैंब्रिज में रामानुजन ने अपने आपको अजनबी पाया| कड़ी सर्दी सहना कठिन था और वह ब्राह्मण और शाकाहारी होने के कारण अपना भोजन स्वयं पकाते थे| फिर भी दृढ़ निश्चय  होकर वह गणित में अपना शोध कार्य करते रहे| हार्डी  और लिटिलवुड  की संगति में वह अपनी कठिनाइयों को भूल जाते थे|
        रामानुजन में हार्डी को एक और व्यवस्थित गणितज्ञ मिला| ऐसा जो पाइथागोरस थ्योरम तो जानता हो  मगर  कोनगुरंट  त्रिकोण का उसे पता ना हो| उनके शोध में कई गलतियां इनकी औपचारिक शिक्षा पूरी ना होने के कारण थी| रामानुजन अंकों  से ऐसे खेलते थे जैसे बच्चा अपने खिलौने से खेलते हैं| यह उनकी शुद्ध  प्रतिभा ही थी जो उन्हें गणित की सच्चाई पर पहुंचा देती थी| उन्हें प्रमाणित करना भी विज्ञान में जरूरी है और वह कार्य उन्होंने अपने से कम प्रतिभाशाली लोगों पर छोड़ दिया|

              28 फरवरी 1998 को उन्हें  रॉयल सोसाइटी का सदस्य चुन लिया गया |वह  दूसरे भारतीय थे जिन्हें इस विशिष्ट सदस्यता का सम्मान मिला था| अक्टूबर में ट्रिनिटी कॉलेज कैंब्रिज के सदस्य बने|वह  पहले भारतीय थे जिन्हें यह सम्मान मिला| कैंब्रिज में उनकी उपलब्धि थी हार्डी- रामानुजन लिटलवुड सर्किल मेथड इन नंबर थ्योरी , रोजर - रामानुजन आईडेंटिटी इन पार्टीशन ऑफ़ इंटिगर्स ,सर्वोच्च (हाईएस्ट) कंपोजिट नंबरों की एक लंबी सूची इसके अतिरिक्त उन्होंने बीजगणित  में अंक सिद्धांत और असमता का बीजगणित  पर भी काम किया| बीजगणित में वितित भिन्न( कंटिन्यूड फ्रेक्शंस) पर उनके कार्य को गणितज्ञ लियोनार्ड यूलर और जेकोबी  की बराबरी पर रखा जाता है|
            जब रामानुजन अपना शोध कार्य कर रहे थे, तपेदिक- तब इस बीमारी का इलाज नहीं था उन्हें खा रहा था| रामानुजन को वापस भारत भेज दिया गया| जब वह जहाज से उतरे तो उनके मित्रों ने उन्हें पीला, थका हुआ और कमजोर पाया| अपनी बीमारी के दर्द को भूलने के लिए वह मृत्यु निकट होने पर भी अंको से खेलते रहे|
           26 अप्रैल 1920 को चेटपेट मद्रास में उनकी मृत्यु हो गई|
              गणितज्ञ होने के साथ-साथ रामानुजन प्रसिद्ध ज्योतिषी और अच्छे वक्ता भी थे| वह 'भगवान, शून्य अनंत' जैसे विषयों पर भाषण देते थे|



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