भारतीय वैज्ञानिक

रविवार, 28 जून 2020

हरगोबिंद खुराना

                  हरगोबिंद खुराना 

भारत एक ऐसा देश है जहाँ कि धरती से अनेकों वैज्ञानिक समय समय पर पैदा हुए और भारत कि शान को पुरे विश्व में बढ़ा कर भारत का नाम रौशन किया |
       ऐसे ही एक वैज्ञानिक थे  - हरगोबिंद खुराना|
          हरगोबिंद खुराना का जन्म भारत में हुआ | माना जाता है उनका जन्म 9 फरवरी 1922 में हुआ , उनकी वास्तविक जन्मतिथि का पता नहीं है | उनके पिता रायपुर ( अब पाकिस्तान ) गाँव के टैक्स कलक्टर थे | उस नन्हे से गाँव में, जहाँ करीब सौ लोग रहते थे, केवल उनका परिवार ही पढ़ा - लिखा था |

          बालक हरगोबिंद खुराना ने पहला पाठ गाँव के अध्यापक से एक बड़े पेड़ कि छाया में बैठ कर पढ़ा | उन्होंने रसायन शास्त्र में बी .एससी. और एम.एससी. की डिग्री लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय से ली | वह सन 1945 में भारत सरकार की छात्रवृत्ति पर लिवरपूल विश्वविद्यालय में पी .एच. डी. करने के लिए गए |  कार्बनिक रसायन शास्त्र में पी .एच. डी. करने के बाद जब वह देश में वापस आये तो उन्हें उपयुक्त काम नहीं मिला | जब अध्यापक के पद के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में दिया प्रार्थना पत्र भी अस्वीकार हो गया तो उन्होंने विदेश जाने का निश्चय किया |

                  हरगोबिंद खुराना ने सन 1959 में एक रसायन ' को एंजाइम ए 'का उत्पादन करके ख्याति पाई | यह रसायन मनुष्य के शरीर की कुछ प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य है| उस समय वह कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में कार्यरत थे | वहाँ से वह यू. एस. ए. में विस्कांसिन विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ़ एंजाइम रिसर्च में आये |  सन 1970 में वह मेसाच्यूट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में जीव विज्ञान एवं रसायन के प्रोफेसर बने |

             46 वर्ष की उम्र में खुराना ने मार्शल डब्ल्यू .निरेनबर्ग और रोबर्ट डब्ल्यू .हॉली के साथ 1968 में सम्मिलित रूप से चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया |तीनों ने अलग अलग काम करके जेनेटिक कोड को समझने में योगदान दिया था |
            एशरिकिआ कोली ऐसा जीवाणु है जो मनुष्यों और जानवरों की अंतड़ियों में रहता है | कैम्ब्रिज ,ब्रिटेन में वैज्ञानिकों की टीम ने पहले ही इसकी संरचना का पता लगा लिया था | खुराना और उनकी टीम ने इस जीवाणु का जीन प्रयोगशाला में बनाने का निश्चय किया | धीरे धीरे उन्होंने एशरिकिआ कोली के 207 जीन बना डाले | इसका चरमोत्कर्ष अगस्त 1976 में हुआ जब इस मनुष्यकृत जीन को एशरिकिआ कोली में डाला गया और वह प्राकृतिक जीन कई तरह काम करने लगा |
                    इस उपलब्धि को संसार भर में आधुनिक जीव विज्ञान की  एक महत्वपूर्ण सफलता मान कर सराहा गया |
                   एशरिकिआ कोली के एक जीन का उत्पादन करने में खुराना और उनके साथियों को 9 वर्ष का अथक श्रम करना पड़ा था |मनुष्य का जीन बनाने की सम्भावना अभी दूर है परन्तु शायद सपना नहीं है |अब धीरे धीरे मनुष्य का जीन बनाने पर भी काम शुरू हो गया है |
                    हरगोबिंद खुराना की मृत्यु 9 नवंबर सन 2011 को 89 वर्ष कई अवस्था में मेसाच्यूट्स यू .एस .में हो गयीं |

सम्मान -

 (1)गैर्डनर फॉउंडेशन   इंटरनेशनल अवार्ड

 (2)लुईसा  फॉउंडेशन   इंटरनेशनल अवार्ड

(3) बेसिक मेडिकल रिसर्च के लिए एल्बर्ट लॉस्कर पुरस्कार
(4) पद्म विभूषण
(5) 1968 में चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार 

शुक्रवार, 19 जून 2020

पंचानन माहेश्वरी

                पंचानन माहेश्वरी 

भारत में सदियों से बड़े बड़े वैज्ञानिको ने जन्म लेकर भारत का नाम ऊँचा किया | उन्ही वैज्ञानिकों में से एक नाम है - पंचानन माहेश्वरी|

            पंचानन माहेश्वरी का जन्म 9 नवंबर सन 1904 में जयपुर राजस्थान में हुआ |उनके पिता लिपिक थे मगर उनकी इच्छा थी कि अपने बेटे को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाएं | उनके पिता ने उन्हें जीवन अनुशासित तरीके से बिताने कि शिक्षा दी | वह स्वयं देर तक काम करते जिससे पंचानन माहेश्वरी के लिए तरह तरह कि किताबें खरीद सकें | उनके घर में सदा  एक छोटी सी प्रयोगशाला रही जिसमे वह अपने शोध कार्य करते थे |
         इलाहबाद विश्वविद्यालय के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में जुलाई सन 1921 में बी.एस सी. में इन्होने प्रवेश लिया | उस समय विश्वविद्यालय में विनफिल्ड नामक अमेरिकन मिशनरी व विख्यात वनस्पति शास्त्री, विभाग के अध्यक्ष व भारतीय वनस्पति शास्त्र सोसायटी के संस्थापक भी थे | यद्यपि छात्र उन्हें सम्मान देते थे मगर कठोर होने के नाते उनसे डरते भी थे | उन्हें प्रसन्न करना कठिन था | लेकिन पंचानन माहेश्वरी में उन्हें वह छात्र मिला जिसकी उन्हें अब तक खोज थी |
          विनफिल्ड पौधों की किस्मे एकत्र करने के लिए पंचानन माहेश्वरी को अभियानों पर लें जाते और यात्रा के दौरान उन्हें प्लांट मॉर्फोलॉजी के मूल सिद्धांत समझाते |
          एम. एस सी. करने के बाद पंचानन माहेश्वरी ने विनफिल्ड के मार्गदर्शन में शोध कार्य आरम्भ किया | उन्होंने एंजियोस्पर्म का आकृति विज्ञान, एनाटमी और भ्रूण विज्ञान का अध्ययन किया |
            पंचानन माहेश्वरी ने एंजियोस्पर्म की कई जातियों में बढ़ने की प्रक्रिया का अध्ययन किया | उन्होंने भ्रूण सम्बन्धी अध्ययन परीक्षण के दौरान पाई जाने वाली भिन्नता के आधार पर इन पौधों का वर्गीकरण भी किया|
           सन 1931 में माहेश्वरी ने डी .एस सी.  को डिग्री भी प्राप्त कर ली |इलाहबाद विश्वविद्यालय छोड़ने से पहले वह विनफिल्ड की अपना आभार प्रकट करने के लिए मिले|
            पंचानन माहेश्वरी लगातार अथक परिश्रम करते रहे | बीरबल साहनी मेडल मिलने के साथ साथ उन्हें सुंदरलाल होरा मेमोरियल मेडल भी मिला और सन 1965 में रॉयल सोसायटी के सदस्य चुने गए |
              सन 1949 में पंचानन माहेश्वरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्र विभाग का अध्यक्ष बनने का निमंत्रण मिला | वह इस बात पर दृढ प्रतिज्ञ थे कि अपने छात्रों को भ्रूण विज्ञान में दिलचस्पी लेने के लिए तैयार करेंगे | यह उनका स्वयं का शोध क्षेत्र था | उस समय यह विषय थोड़ा उपेक्षित था|¢उन्होंने इस क्षेत्र में शोधकार्य करने का निश्चय किया मगर महंगे उपकरण का उपयोग नहीं किया |उनके प्रयास को सफलता मिली|वनस्पति शास्त्र विभाग कि प्रगति ही नहीं हुई बल्कि विदेश में भी उसका नाम हो गया | और स्थानों के वैज्ञानिक भी इस क्षेत्र में शोधकार्य करने लगे | पंचानन माहेश्वरी को आधुनिक भ्रूण विज्ञान का प्रवर्तक कहा जा सकता है |

               उन्हीने ही एंजियोस्पर्म पौधों में टेस्ट ट्यूब तकनीक कि प्रक्रिया का आविष्कार किया |तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि फूल वाले पौधों का निषेचन टेस्ट ट्यूब में भी हो सकता है |
              माहेश्वरी ने दो प्रामाणिक पुस्तकें एन इंट्रोडक्शन टू दी एम्ब्र्योलॉजी ऑफ़ एंजियोस्पर्म और रिसेंट एडवांसेज इन एम्ब्र्योलॉजी ऑफ़ एंजियोस्पर्म लिखी है |
           सन 1951 में उन्होंने इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ़ प्लांट मॉर्फोलॉजिस्ट्स नामक संस्था कि स्थापना की |  18 मई सन 1966 में जब उनका देहांत हुआ तब तक वह फायटो मॉर्फोलॉजी नामक पत्रिका का संपादन करते रहे |





शुक्रवार, 12 जून 2020

सत्येंद्र नाथ बोस

        सत्येंद्र नाथ बोस 

 भारत में एक से बढ़ कर एक अनेक वैज्ञानिको ने समय समय पर दुनिया में अपना परचम फहराया , और भारत की छवि को विश्व में ऊपर उठाने का काम किया है | ऐसे ही एक भारतीय वैज्ञानिक थे एस .एन .बोस |
         जब शिक्षा शास्त्री आशुतोष मुखर्जी ने कलकत्ता में यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ साइंस की स्थापना की तो कॉलेज में ढंग का पुस्तकालय नहीं था | सन 1916 में जब दो प्रतिभाशाली युवकों ने कॉलेज में प्राध्यापक पद संभाला तो उनका लक्ष्य था भौतिकी और गणित में शोध कार्य | लेकिन पुस्तकालय की दशा देखकर उन्हें बड़ी निराशा हुई |

              यह उन दिनों की बात है जब भौतिकी में एक क्रांति हो रही थी और आधुनिक भौतिक शास्त्र अपना आकार लें रहा था | जर्मन भौतिक शास्त्री मैक्स प्लान्क ने क्वांटम थ्योरी पेश की थी | अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने आपेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत किया था | इसके अतिरिक्त परमाणु की आंतरिक संरचना को समझने में भी बहुत प्रगति हो रही थी | यद्यपि अन्य प्राध्यापक पुराना भौतिक शास्त्र ही पढ़ा कर संतुष्ट थे मगर ये दोनों युवक जानना चाहते थे कि अब आधुनिक भौतिक शास्त्र में कितनी प्रगति हुई है |

               यह जरा कठिन था | प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था,  इस कारण नवीनतम पुस्तकें और पत्रिकाएं भारत में नहीं पहुँच रही थी | निराश होकर दोनों ने पुस्तकें ढूढ़नी शुरू कर दी | एक जर्मन वैज्ञानिक पी .जे. ब्रुहल जो उस समय देश में ही रह रहे थे,  के पास आधुनिक भौतिक शास्त्र पर कुछ पुस्तकें और लेख थे | किन्तु ये सब जर्मन भाषा में थे |
                 दोनों वैज्ञानिक अपनी खोज में लगे रहे |उन्होंने जर्मन भाषा सीखी | कुछ समय बाद अध्यापक और उनके शिष्य उन्हें आधुनिक भौतिकी कि नई खोज पर विवेचना करते हुए देखने लगे |
                  सन 1920 में उन्होंने अल्बर्ट आइन्स्टाइन के आपेक्षता के  सिद्धांत   सम्बन्धी शोधपत्रों   का जर्मन भाषा से अंग्रेजी में अनुवाद किया |
                  ये दो युवक और कोई नहीं,  सत्येंद्र नाथ बोस और मेघनाद साहा थे | कुछ समय तक उन्होंने साथ साथ शोधकार्य किया फिर साहा विदेश चले गए और बोस ढाका यूनिवर्सिटी में कार्य करने लगे |
                बोस के जीवन में यह एक नया मोड़ था | इनका एक मित्र जो अभी अभी विदेश से लौटा था उसने इन्हे मैक्स प्लान्क कि प्रसिद्ध पुस्तक "थर्मोडायनमिक्स एंड हीट" उपहार के तौर पर दी | इस पुस्तक में प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री के मूल लेख थे | बोस ने उसे पढ़ने के बाद स्वयं ही इक्वेशन और फॉर्मूले हल कर लिए |
                 फिर भी वह एक स्थान पर अटक गए | प्लान्क ने एक स्थान पर परिकल्पना से एक इक्वेशन कि अनुमानित गणना कर लीं थी |" किसी विचार को तब तक स्वीकार नहीं करना चाहिए जब तक तुम स्वयं उससे संतुष्ट नहीं होते  " यह बोस का आदर्श था | इसलिए उन्होंने इस पर काम करना शुरू किया और इस दौरान थ्योरेटिकल या मैथमेटिकल फिज़िक्स के विकास में कीर्तिमान स्थापित कर दिए | उस समय बोस कि आयु करीब 30 वर्ष कि होगी |
                    बोस ने 4 पन्ने का अपना शोध लेख " प्लांक्स लॉ एंड लाइट क्वांटम हाइपोथिसिस " एक भारतीय पत्रिका के पास भेजा और  फिर कई विदेशी पत्रिकाओं को | सबने उसे अस्वीकार कर दिया |
                   सन 1924 में हताश होकर बोस ने अपना लेख  अल्बर्ट आइन्स्टाइन को भेजा | बोस ने अपने उस लेख में एक दुस्साहसी विचार रखा था जिसने अल्बर्ट आइन्स्टाइन को बहुत प्रभावित किया | यहाँ तक कि अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने उस पेपर का स्वयं जर्मन में अनुवाद किया और एक पत्रिका में प्रकाशित करवाया |
                    बोस के पेपर ने एक नए प्रकार की सांख्यिकी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |
                      विकिरण के व्यवहार को समझाने के लिए उन्होंने जो सांख्यिकी  हल की उसे बोस स्टेटिस्टिक्स कहते हैं | मूल तत्व के कण जैसे फोटोन्स और अल्फा कण जो बोस सांख्यिकी के सिद्धांत को मानते हैं उन्हें बोसोन्स कहा जाता है | इस प्रकार उनका नाम विज्ञान का एक भाग बन गया |

                    बोस का जन्म 1 जनवरी सन 1894 में हुआ था | जब वह स्कूल में ही थे तो लोग समझने लगे थे कि वह पियरे साइमन लैपलेस और ऑगस्टिन लुई काउची जैसा प्रसिद्ध गणितज्ञ बनेगा | प्रश्नों को हल करने कि उसकी प्रतिभा उसके अध्यापकों को इतना प्रभावित करती थी कि वह उसे 100 में से 110 अंक दें दिया करते थे | उनकी महत्वपूर्ण खोज के 34 वर्ष बाद अपने जीवन के अंत में उन्हें रॉयल सोसायटी का सदस्य चुना गया |
                  बोस ने भौतिकी को अन्य शाखाओं में जैसे एक्स - रे क्रिस्टलोग्राफी और उष्मागतिकी पर भी प्रयोग किये | उन्होंने एक रासायनिक यौगिक भी बनाया जो आज तक आँखों में दवाई के तौर पर डाला जाता है|

                   कलकत्ते में उनकी खोज बोस स्टेटिस्टिक्स कि स्वर्ण जयंती के सम्मान में एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार हुआ | उस अवसर पर बोस ने कहा कि अब उन्हें और जीने कि इच्छा नहीं है क्योंकि उनकी खोज को पुरे संसार में मान्यता मिल गयीं है | एक महीने बाद 4 फरवरी सन 1974 को उनका देहांत हो गया | उनकी मेज पर एक आधी हल की हुई समस्या पड़ी थी | यह समस्या संख्या सिद्धांत से सम्बंधित थी |

शुक्रवार, 5 जून 2020

बीरबल साहनी

             बीरबल साहनी 

 सन 1932 में एक विदेशी वैज्ञानिक लखनऊ विश्वविद्यालय में बीरबल साहनी से मिलने आया | वह भारत के एक महान पेलियोबॉटनिस्ट (जीवाश्म वनस्पति विज्ञानी) थे | उन्हें छोटे वनस्पति संग्रहालय के एक कोने में बैठा देखकर वह विस्मित सा रह गया |  " हैल्लो प्रोफेसर साहनी , " वह उनसे हाथ मिलाता हुआ बोला,  " आपके पास बैठने का स्वयं का कमरा तक नहीं है | "
" महान वैज्ञानिको ने दुछत्तियो तक में बैठकर काम किया है, " साहनी साहब ने उत्तर दिया|
            पिछले युग कि वनस्पतियों का अध्धयन इस देश के लिए एक नया विज्ञान था| इसे जीवाश्म वनस्पति विज्ञान (पेलियोबॉटनी ) कहते हैं | ऐसे उपकरण उपलब्ध नहीं थे जिससे चट्टान को काटा या पीसा जा सके | और उनमें अंकित लुप्त वनस्पति जीवाश्मों का अध्धयन किया जा सके | साहनी अपना बहुत सा समय स्वयं अपने कुशल हाथों से यह काम करते हुए बिताते | वह अपने पैसे से ही नए उपकरण भी खरीदते | वास्तव में जीवाश्म वनस्पति विज्ञान के अध्धयन को समर्पित एक संस्थान का निर्माण उनकी महत्वाकांक्षा थी |

          अध्यापक होने के नाते साहनी ने पहले वनस्पति विज्ञान विभाग में पढ़ाने का स्तर ऊंचा किया | इसके बाद उन्होंने भूविज्ञान विभाग कि स्थापना की | उनके सपनों की संस्था इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेलियोबॉटनी की स्थापना उसके बाद हुई | यह दुनिया में अपने तरह की पहली संस्था थी | सन 1941 में जब श्री जवाहर लाल नेहरू ने इस संस्था की इमारत की आधारशिला रखी तो उसके एक सप्ताह बाद ही साहनी जी का स्वर्गवास हो गया | उनके अधूरे कार्य को उनकी पत्नी ने पूरा किया | आज यह संस्था बीरबल साहनी
इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेलियोबॉटनी के नाम से प्रसिद्ध है |

                साहनी का जन्म 14 नवंबर सन   1891 में पंजाब के भेरा नामक नगर में हुआ जो अब पाकिस्तान में है | उनके पिता रसायन विज्ञान के अध्यापक थे  जिन्हे प्रकृति अध्ययन में बड़ी दिलचस्पी थी | गर्मी की छुट्टियों में पिता अपने पुत्र को पहाड़ो में घुमाने ले जाते थे | वे साथ साथ चट्टानों के टुकड़े  पौधे और जीवाश्म वाली चट्टानें इकट्ठा करते| युवा साहनी वनस्पति और भूविज्ञान में इतनी रूचि लेने लगे कि उन्होंने अपने पिता कि इच्छा के विरुद्ध इन्हे अपनी जीविका का साधन भी बना लिया | उनके पिता चाहते थे कि वह इंडियन सिविल सर्विस में प्रवेश लें |
            सन 1911 में पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर से बी . ए. पास करके वह ब्रिटेन चले गए | सन 1919 में उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय से डी. एससी. की  डिग्री प्राप्त की | इसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक ऐ .सी. स्टुअर्ड के निर्देशन में फ़र्न,  कोनिफर्स और जीवाश्म पौधों पर शोध कार्य किया | वह प्रथम भारतीय थे जिन्हे सन 1929 में कैंब्रिज से  डी. एससी की डिग्री मिली | सन 1936 में वह रॉयल सोसायटी के सदस्य चुने गए |
      वह प्रथम वनस्पति वैज्ञानिक थे जिन्होंने इंडियन गोंडवाना के पेड़ पौधों का विस्तार से अध्ययन किया | उन्होंने बिहार की राजमहल पहाड़ियों की भी खोजबीन की | वहाँ उन्होंने पौधों के कुछ नए जीन्स की खोज की | उनके कुछ आविष्कारों ने प्राचीन पौधों और आधुनिक पौधों के बीच विकासक्रम के सम्बन्ध को समझने में मदद की |
         उन्होंने एक नए समूह के जीवाश्म पौधों की खोज की | ये जिम्नोस्पर्म हैं | चीड़ तथा उनकी जाति के दूसरे पेड़ जिन्हे पेंटोजाइलीज कहते हैं |

       साहनी एक भू विज्ञानी भी थे | इसके अतिरिक्त साहनी की पुरातत्व विज्ञान में भी बड़ी रूचि थी | उनकी एक खोज यात्रा में उन्हें सन 1936 में रोहतक में सिक्के बनाने के सांचे मिले थे | प्राचीन भारत में सिक्के ढालने के तरीको के अध्ययन और खोज पर उन्हें न्यू मिस्मैटिक सोसायटी ऑफ़ इंडिया la नेलसन राइट मेडल भी मिला | वह चित्रकला और क्ले मॉडलिंग में भी बहुत दक्ष थे | उनके पास डाक टिकटों और सिक्कों का भी एक बहुत बड़ा संग्रह था |  

बुधवार, 27 मई 2020

विक्रम ए. साराभाई

               विक्रम ए. साराभाई  

 1943 में विक्रम साराभाई जो उस समय केवल 23 वर्ष के थे ऊचाई पर अंतरिक्ष किरणों का अध्ययन करने के लिए कश्मीर में हिमालय पर पहुंचे | उन्हें वह स्थान इतना अच्छा लगा कि उन्होंने वहाँ अंतरिक्ष किरणों का अध्ययन करने के लिए प्रयोगशाला खोलने  का  निश्चय किया |
        ब्रिटेन से पी .एच.  डी. करके लौटने पर उन्होंने भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला कि नींव अहमदाबाद में रखी | यह संस्था अंतरिक्ष किरणों और बाह्य अंतरिक्ष को समर्पित है | सन 1955 में उन्होंने प्रयोगशाला कि शाखा कश्मीर के गुलमर्ग नामक स्थान में स्थापित की |  इसी तरह अन्य केंद्र तिरुअनंतपुरम और कोडाईकनाल में स्थापित की |

            साराभाई का जन्म 12 अगस्त सन 1919 में हुआ था  और उनका जीवन भी भाभा से बहुत मिलता -जुलता था | उनका परिवार भी धनी था | यदि वह चाहते तो उद्योगपति बन सकते थे | लेकिन उनकी मूल रूचि गणित और भौतिकी में थी | भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला का उद्देश्य वहीं था जो भाभा की संस्था टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च का है |  यह संस्था देश को अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए वैज्ञानिक और तकनीक उपलब्ध कराती है |

          वास्तव में साराभाई भारतीय अंतरिक्ष  अनुसंधान संगठन ( इसरो ) का विस्तार करके देश को अंतरिक्ष युग में ले गए | आज अंतरिक्ष तकनीक में भारत की जो उपलब्धियां है उसका श्रेय साराभाई को ही है|यद्द्पि अपने परिश्रम का परिणाम देखने के लिए वह जीवित नहीं रहे | उनके द्वारा शुरू की गयीं योजनाओं में एक वह भी थी जिसके अंतर्गत सन 1975 में आर्यभट्ट उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा गया था | सन 1975 - 76 में सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविज़न एक्सपेरिमेंट (साइट ) कार्यक्रम जिसका लक्ष्य 2400 भारतीय गांवों में रहने वाले 50 लाख लोगो तक शिक्षा पहुंचना था , का श्रेय भी उन्ही को जाता है |
          एक दृष्टि में साराभाई भाभा से भी एक कदम आगे थे | उन्होंने विभिन्न प्रकार के प्रतिष्ठानों की स्थापना की |
           भाभा की तरह उनकी मृत्यु जल्दी हो गयीं , जब वह केवल 52 वर्ष के थे | विज्ञान और समाज की सेवा के लिए उन्हें कई तरह से सम्मानित किया गया एवं अवार्ड भी मिले | अंतराष्ट्रीय एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने चन्द्रमा के सी ऑफ़ सिरिनिटी क्षेत्र में एक क्रेटर का नाम इनके नाम पर रखकर उन्हें सम्मानित किया |
           

मंगलवार, 26 मई 2020

चंद्रशेखर वेंकट रमण (सी. वी. रमण )

  चंद्रशेखर वेंकट रमण  (सी. वी. रमण )

कलकत्ते के व्यस्त बहू बाजार में 210 नंबर पर एक पुरानी इमारत है | देश में यह वैज्ञानिक संस्था का मुख्यालय था | इस संस्था का नाम है इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस | सन 1927 में दिसंबर की एक साँझ को उसकी एक प्रयोगशाला में बड़ी उत्तेजना का वातावरण था | चंद्रशेखर वेंकट रमण एक मेहमान की प्रयोगशाला के उपकरण दिखा रहे थे तभी एक चश्माधारी युवक के. एस. कृष्णन लपक कर भीतर आया और बोला," प्रोफेसर कॉम्प्टन को नोबेल पुरस्कार मिला है |''

             यह सुनकर रमण बहुत प्रसन्न हुए ," बहुत अच्छी खबर लाये हो , '' उन्होंने खुश होकर कहा | वह फिर विचारों में खो गए |
             " लेकिन कृष्णन एक बात है,  यदि एक्स - रे के बारे में कॉम्प्टन इफ़ेक्ट सही है तो प्रकाश के लिए भी उसे सही होना चाहिए |''
                कुछ वर्ष पूर्व ए. एच. कॉम्प्टन ने यह प्रमाणित किया था कि एक्स -रे कि प्रकृति किसी पदार्थ से गुजरते समय  बदल जाती है | परिवर्तन पदार्थ के प्रकार पर निर्भर होता है | इसे कॉम्प्टन इफ़ेक्ट के नाम से जाना जाता है |
               यदि प्रकाश पारदर्शी माध्यम से गुजरेगा तो क्या उसकी प्रकृति में भी बदलाव आ जायेगा ? रमण ने यही प्रश्न पूछा था | 5 वर्षो से वह प्रकाश विज्ञान (ऑप्टिक्स ) पर शोध कार्य कर रहे थे | उनकी प्रयोगशाला में बहुत विकसित किस्म के उपकरण भी नहीं थे | लेकिन रमण को अपने पर पूरा भरोसा था कि उपकरणों में कुछ बदलाव करके वह इस प्रश्न का उत्तर अवश्य खोज निकालेंगे |

                  4 महीने बाद ही 16 मार्च सन 1928 को उन्होंने अपनी खोज नए विकिरण (न्यू रेडिएशन )के बारे में बंगलुरु में उपस्थित विशिष्ट वैज्ञानिको को बताया | संसार में यह खोज रमण इफ़ेक्ट के नाम से प्रसिद्ध हुई | इस खोज पर ही उन्हें सन 1930 का नोबेल पुरस्कार. मिला था |
              रमण का जन्म 7 नवंबर सन 1888 में तमिलनाडु के एक शहर त्रिचिरापल्ली में हुआ था | उनके पिता कॉलेज में भौतिकी के प्राध्यापक थे |जब रमण ने दसवीं पास कर लीं तब उनके माता पिता ने उच्च शिक्षा के लिए उन्हें विदेश भेजना चाहा | किन्तु एक ब्रिटिश सर्जन ने उन्हें इसके विरुद्ध सलाह दी | रमण देश में ही रहे और मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से उन्होंने एम. ए. कि डिग्री प्राप्त की |

               विज्ञान ने उन्हें बहुत प्रभावित किया था और वह प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिकाओं में शोध लेख लिखने लगे | 19 वर्ष की आयु में ही वह इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस के सदस्य भी बन गए | अपने माता - पिता की इच्छा के अनुसार उन्होंने कलकत्ते में वित्त मंत्रालय में एक प्रशासनिक पद पर नियुक्ति ले लीं | परन्तु इससे विज्ञान ने उनकी दिलचस्पी कम नहीं हुई | ऑफिस से आने के बाद उनका सारा समय एसोसिएशन की प्रयोगशाला में व्यतीत होता |
                विदेश की वापसी यात्रा के समय आकाश और जल के नीलेपन ने उनमे एक जिज्ञासा उत्पन्न कर दी | भला ये दोनों नील क्यों हैं ? जहाज के डेक पर बैठकर वह इस प्रश्न का हल खोजते रहे | और वह इस परिणाम पर पहुंचे कि नील रंग का कारण यह था कि पानी के अणु प्रकाश को छितरा देते हैं | कलकत्ते में अपनी प्रयोगशाला में लौटने पर वह इस विचार को प्रमाणित करने में लग गए | इस तरह से ऑप्टिक्स में उनका शोधकार्य आरम्भ हुआ,  जिससे उनको इतनी ख्याति मिली |
         सन 1924 में रॉयल सोसायटी ने रमण को प्रकाश विज्ञान में उनके योगदान के लिए अपना सदस्य बना लिया और 6वर्ष बाद प्रकाश विज्ञान (ऑप्टिक्स ) पर ही उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया और संसार में प्रसिद्धि मिली |
          आखिर सन 1943 में बंगलुरु के निकट उन्होंने अपना संस्थान खोला - रमण इंस्टिट्यूट | यहाँ पर वह 20 नवंबर 1970 में अपनी मृत्यु तक बराबर कार्य करते रहे |
           युवा वैज्ञानिको को उनकी सलाह थी कि चारो ओर देखो,  अपने को अपनी प्रयोगशाला में बंद कर लो | " विज्ञान का सार उपकरण नहीं, बल्कि स्वतंत्र सोच विचार और परिश्रम है | ''
        

रविवार, 24 मई 2020

एम. एस. स्वामीनाथन

             एम. एस. स्वामीनाथन 

छठे दशक के अंत में देश में खाद्य उत्पादन मांग से काफी कम था | इस समस्या का कोई हल नजर नहीं आ रहा था | भविष्य अंधकारमय था |
          एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट के युवा वैज्ञानिक मोनकोम्बू सांबशिवन स्वामीनाथन (एम. एस. स्वामीनाथन ) के लिए यह एक चुनौती थी | बहुत शोध कार्य के बाद उन्होंने महसूस किया कि गेहूं कि मेक्सिकन बौनी किस्म ही जिसका विकाश अभी - अभी नोबेल पुरस्कार विजेता एन. ई . बोरलॉग ने किया था,  इस समस्या का हल है |
           स्वामीनाथन  की प्रेरणा से बोरलॉग स्थिति का अध्धयन करने भारत आये और कई किस्म की मेक्सिकन बौनी जातियाँ उपलब्ध कराई | वह इस देश में उगाने के योग्य पाई गयीं और देश के अनाज उत्पादन में चमत्कारिक ढंग से उन्नति हुई | एक ही दशक में उत्पादन दुगना हो गया | बोरलॉग की तरह ही स्वामीनाथन को भी भारत में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है |

            स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 में कुम्भ्कोनम नामक शहर में हुआ | उनकी प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु में हुई | उसके बाद वह ब्रिटेन गए और सन 1952  में कैंब्रिज में स्कूल ऑफ़ एग्रीकल्चर से उन्होंने पी. एच .डी. की डिग्री लीं | अगले साल दो दशक उन्होंने भिन्न - भिन्न फसलों पर इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट में व्यावहारिक आनुवंशिकी विज्ञान पर (अप्लाइड जेनेटिक्स)  शोधकार्य करते हुए बिताये | उन्होंने ज्यादा गेहूं और चावल की किस्मों का विकास किया | आलू और जूट में भिन्न जातियों के संकरण का कठिन काम सफलता से किया |
              स्वामीनाथन एक कुशल प्रशासक, और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो एक वैज्ञानिक में दुर्लभ गुण है | वह कई योजनाएं बनाते रहे हैं जिसमे प्रयोगशालाओं में होने वाले शोधकार्यो का लाभ किसान भी उठा सके | उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए आधुनिक तरीके और विधि का उपयोग भी किया है | देश की कृषि क्षमताओं में नया आत्मविश्वास जगाने के लिए सन 1971 में उन्हें रेमन मेग्सेसे अवार्ड मिला | उन्हें एम. एस. भटनागर अवार्ड , बीरबल साहनी मेडल और मेंडल मेमोरियल अवार्ड भी मिल चुके हैं|

        इस समय वह फिलीपींस में इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं |