भारतीय वैज्ञानिक : होमी जहाँगीर भाभा

शुक्रवार, 22 मई 2020

होमी जहाँगीर भाभा

               होमी जहाँगीर भाभा 

 बाह्य अंतरिक्ष से आने वाली अंतरिक्ष किरणों के कण बहुत छोटे - छोटे और  तेज गति से चलने वाले होते हैं | जब  ये कण पृथ्वी के वायुमंडल में  प्रवेश  करते है तो हवा में मौजूद परमाणुओं से टकराकर इलेक्ट्रान की  वर्षा सी करते हैं | सन 1937 में एक भारतीय भौतिक वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा  और डब्लू .हैटलर  ने इन किरणों का रहस्य खोला और दोनों भौतिक विज्ञानी संसार में प्रसिद्ध हो गए |
       भाभा एक कदम और आगे बढे | उन्होंने इलेक्ट्रान की  वर्षा में एक नए आणविक कण की उपश्थिति को पहचाना | इसे उन्होंने मेसॉन नाम दिया |इस कण में उन्हें आइंसटाइन के आपेक्षता के सिद्धांत का प्रायोगिक प्रमाण भी मिला |

     भाभा का जन्म 30 अक्टूबर सन 1909 में एक धनी पारसी परिवार में हुआ था | घर पर विज्ञान की पुस्तकों का एक अच्छा पुस्तकालय था इसलिए बचपन से ही वह विज्ञान में रूचि लेने लगे थे |
         उनके पिता उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते थे और उन्हें उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेज दिया | लेकिन उनकी रूचि भौतिकी में हो गयीं | विदेश में शिक्षा पाते  हुए उन्हें कई मेडल और शिक्षावृत्तियाँ मिली | 
        भाभा को प्रसिद्ध भौतिक शास्त्रियों जैसे एनरिको फर्मी और वुल्फगैंग पाउली के साथ काम करने का अवसर भी मिला |
            सन 1940 में यह युवा भौतिक विज्ञानी अपने देश लौट आया | भाभा ने बंगलौर में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस में कार्य शुरू किया | वहां वे अंतरिक्ष किरणों पर शोध कार्य करने लगे | ऐसे विशाल प्लास्टिक गुब्बारों में जो वापस लाये जा सके उपकरण रखकर उन्हें आकाश में ऊँचा भेजा जाता था|
         इस दौरान भाभा अंतरिक्ष किरणों,प्राथमिक कण और क्वांटम यांत्रिकी जैसे क्षेत्रों में अपने योगदान के लिए रॉयल सोसायटी के सदस्य चुन लिए गए |
       उनकी बाते ऐसी थी की लोग ध्यान देने के लिए बाध्य होते थे | सभी वैज्ञानिको ने उनके एक रिसर्च इंस्टिट्यूट बनाने के विचार का समर्थन किया | भाभा देश के अग्रणी उद्योगपति टाटा परिवार से सम्बंधित थे | सन 1944 में उन्होंने एक पत्र टाटा ट्रस्टीज़ को लिखा और इनसे एक संस्थान बनाने के लिए आग्रह किया |
        सन 1945 में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च नामक संस्था की स्थापना हुई | प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने भाभा को अपनी इच्छानुसार काम करने को कहा | सन 1948 में परमाणु शक्ति आयोग की स्थापना की गयीं और भाभा इसके चैयरमैन बने | तब से आणविक ऊर्जा के प्रयोग और परीक्षणों ने और जोर पकड़ा | भाभा के कुशल निर्देशन में तीन परमाणु रिएक्टरो - अप्सरा,  सिरस,  जरलिना की स्थापना हुई |
               सन 1963 में देश के पहले परमाणु बिजलीघर का निर्माण तारापुर में शुरू हुआ | 18 मई सन 1974 में इसका चरमोत्कर्ष तब हुआ जब भारतीय वैज्ञानिको ने राजस्थान के पोखरण में शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अणु विस्फोट किया | भारत छठा देश था जो नुक्लिएर बिरादरी में खड़ा हुआ |

           भाभा ने इलेक्ट्रॉनिक्स , अंतरिक्ष विज्ञान , रेडियो खगोलविज्ञान, माइक्रोबायोलॉजी में भी प्रयोग किये | ऊटी में लगा रेडियो टेलिस्कोप भाभा की जी देन है | वह परमाणु  शांति के लिए (एटम फॉर पीस ) नाम की कॉन्फ्रेंस के विशिष्ट सदस्य थे | अपनी एक विदेश  यात्रा के दौरान विमान दुर्घटना में 57 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गयीं |
         भाभा की इस आकस्मिक मृत्यु पर सारे देश ने शोक मनाया | सन 1967 में परमाणु शक्ति संस्थान, ट्राम्बे का नाम बदलकर भाभा के समर्पित कार्य के सम्मान व श्रद्धांजलि के रूप में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर रख दिया गया |

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