भारतीय वैज्ञानिक

बुधवार, 27 मई 2020

विक्रम ए. साराभाई

               विक्रम ए. साराभाई  

 1943 में विक्रम साराभाई जो उस समय केवल 23 वर्ष के थे ऊचाई पर अंतरिक्ष किरणों का अध्ययन करने के लिए कश्मीर में हिमालय पर पहुंचे | उन्हें वह स्थान इतना अच्छा लगा कि उन्होंने वहाँ अंतरिक्ष किरणों का अध्ययन करने के लिए प्रयोगशाला खोलने  का  निश्चय किया |
        ब्रिटेन से पी .एच.  डी. करके लौटने पर उन्होंने भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला कि नींव अहमदाबाद में रखी | यह संस्था अंतरिक्ष किरणों और बाह्य अंतरिक्ष को समर्पित है | सन 1955 में उन्होंने प्रयोगशाला कि शाखा कश्मीर के गुलमर्ग नामक स्थान में स्थापित की |  इसी तरह अन्य केंद्र तिरुअनंतपुरम और कोडाईकनाल में स्थापित की |

            साराभाई का जन्म 12 अगस्त सन 1919 में हुआ था  और उनका जीवन भी भाभा से बहुत मिलता -जुलता था | उनका परिवार भी धनी था | यदि वह चाहते तो उद्योगपति बन सकते थे | लेकिन उनकी मूल रूचि गणित और भौतिकी में थी | भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला का उद्देश्य वहीं था जो भाभा की संस्था टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च का है |  यह संस्था देश को अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए वैज्ञानिक और तकनीक उपलब्ध कराती है |

          वास्तव में साराभाई भारतीय अंतरिक्ष  अनुसंधान संगठन ( इसरो ) का विस्तार करके देश को अंतरिक्ष युग में ले गए | आज अंतरिक्ष तकनीक में भारत की जो उपलब्धियां है उसका श्रेय साराभाई को ही है|यद्द्पि अपने परिश्रम का परिणाम देखने के लिए वह जीवित नहीं रहे | उनके द्वारा शुरू की गयीं योजनाओं में एक वह भी थी जिसके अंतर्गत सन 1975 में आर्यभट्ट उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा गया था | सन 1975 - 76 में सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविज़न एक्सपेरिमेंट (साइट ) कार्यक्रम जिसका लक्ष्य 2400 भारतीय गांवों में रहने वाले 50 लाख लोगो तक शिक्षा पहुंचना था , का श्रेय भी उन्ही को जाता है |
          एक दृष्टि में साराभाई भाभा से भी एक कदम आगे थे | उन्होंने विभिन्न प्रकार के प्रतिष्ठानों की स्थापना की |
           भाभा की तरह उनकी मृत्यु जल्दी हो गयीं , जब वह केवल 52 वर्ष के थे | विज्ञान और समाज की सेवा के लिए उन्हें कई तरह से सम्मानित किया गया एवं अवार्ड भी मिले | अंतराष्ट्रीय एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने चन्द्रमा के सी ऑफ़ सिरिनिटी क्षेत्र में एक क्रेटर का नाम इनके नाम पर रखकर उन्हें सम्मानित किया |
           

मंगलवार, 26 मई 2020

चंद्रशेखर वेंकट रमण (सी. वी. रमण )

  चंद्रशेखर वेंकट रमण  (सी. वी. रमण )

कलकत्ते के व्यस्त बहू बाजार में 210 नंबर पर एक पुरानी इमारत है | देश में यह वैज्ञानिक संस्था का मुख्यालय था | इस संस्था का नाम है इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस | सन 1927 में दिसंबर की एक साँझ को उसकी एक प्रयोगशाला में बड़ी उत्तेजना का वातावरण था | चंद्रशेखर वेंकट रमण एक मेहमान की प्रयोगशाला के उपकरण दिखा रहे थे तभी एक चश्माधारी युवक के. एस. कृष्णन लपक कर भीतर आया और बोला," प्रोफेसर कॉम्प्टन को नोबेल पुरस्कार मिला है |''

             यह सुनकर रमण बहुत प्रसन्न हुए ," बहुत अच्छी खबर लाये हो , '' उन्होंने खुश होकर कहा | वह फिर विचारों में खो गए |
             " लेकिन कृष्णन एक बात है,  यदि एक्स - रे के बारे में कॉम्प्टन इफ़ेक्ट सही है तो प्रकाश के लिए भी उसे सही होना चाहिए |''
                कुछ वर्ष पूर्व ए. एच. कॉम्प्टन ने यह प्रमाणित किया था कि एक्स -रे कि प्रकृति किसी पदार्थ से गुजरते समय  बदल जाती है | परिवर्तन पदार्थ के प्रकार पर निर्भर होता है | इसे कॉम्प्टन इफ़ेक्ट के नाम से जाना जाता है |
               यदि प्रकाश पारदर्शी माध्यम से गुजरेगा तो क्या उसकी प्रकृति में भी बदलाव आ जायेगा ? रमण ने यही प्रश्न पूछा था | 5 वर्षो से वह प्रकाश विज्ञान (ऑप्टिक्स ) पर शोध कार्य कर रहे थे | उनकी प्रयोगशाला में बहुत विकसित किस्म के उपकरण भी नहीं थे | लेकिन रमण को अपने पर पूरा भरोसा था कि उपकरणों में कुछ बदलाव करके वह इस प्रश्न का उत्तर अवश्य खोज निकालेंगे |

                  4 महीने बाद ही 16 मार्च सन 1928 को उन्होंने अपनी खोज नए विकिरण (न्यू रेडिएशन )के बारे में बंगलुरु में उपस्थित विशिष्ट वैज्ञानिको को बताया | संसार में यह खोज रमण इफ़ेक्ट के नाम से प्रसिद्ध हुई | इस खोज पर ही उन्हें सन 1930 का नोबेल पुरस्कार. मिला था |
              रमण का जन्म 7 नवंबर सन 1888 में तमिलनाडु के एक शहर त्रिचिरापल्ली में हुआ था | उनके पिता कॉलेज में भौतिकी के प्राध्यापक थे |जब रमण ने दसवीं पास कर लीं तब उनके माता पिता ने उच्च शिक्षा के लिए उन्हें विदेश भेजना चाहा | किन्तु एक ब्रिटिश सर्जन ने उन्हें इसके विरुद्ध सलाह दी | रमण देश में ही रहे और मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से उन्होंने एम. ए. कि डिग्री प्राप्त की |

               विज्ञान ने उन्हें बहुत प्रभावित किया था और वह प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिकाओं में शोध लेख लिखने लगे | 19 वर्ष की आयु में ही वह इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस के सदस्य भी बन गए | अपने माता - पिता की इच्छा के अनुसार उन्होंने कलकत्ते में वित्त मंत्रालय में एक प्रशासनिक पद पर नियुक्ति ले लीं | परन्तु इससे विज्ञान ने उनकी दिलचस्पी कम नहीं हुई | ऑफिस से आने के बाद उनका सारा समय एसोसिएशन की प्रयोगशाला में व्यतीत होता |
                विदेश की वापसी यात्रा के समय आकाश और जल के नीलेपन ने उनमे एक जिज्ञासा उत्पन्न कर दी | भला ये दोनों नील क्यों हैं ? जहाज के डेक पर बैठकर वह इस प्रश्न का हल खोजते रहे | और वह इस परिणाम पर पहुंचे कि नील रंग का कारण यह था कि पानी के अणु प्रकाश को छितरा देते हैं | कलकत्ते में अपनी प्रयोगशाला में लौटने पर वह इस विचार को प्रमाणित करने में लग गए | इस तरह से ऑप्टिक्स में उनका शोधकार्य आरम्भ हुआ,  जिससे उनको इतनी ख्याति मिली |
         सन 1924 में रॉयल सोसायटी ने रमण को प्रकाश विज्ञान में उनके योगदान के लिए अपना सदस्य बना लिया और 6वर्ष बाद प्रकाश विज्ञान (ऑप्टिक्स ) पर ही उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया गया और संसार में प्रसिद्धि मिली |
          आखिर सन 1943 में बंगलुरु के निकट उन्होंने अपना संस्थान खोला - रमण इंस्टिट्यूट | यहाँ पर वह 20 नवंबर 1970 में अपनी मृत्यु तक बराबर कार्य करते रहे |
           युवा वैज्ञानिको को उनकी सलाह थी कि चारो ओर देखो,  अपने को अपनी प्रयोगशाला में बंद कर लो | " विज्ञान का सार उपकरण नहीं, बल्कि स्वतंत्र सोच विचार और परिश्रम है | ''
        

रविवार, 24 मई 2020

एम. एस. स्वामीनाथन

             एम. एस. स्वामीनाथन 

छठे दशक के अंत में देश में खाद्य उत्पादन मांग से काफी कम था | इस समस्या का कोई हल नजर नहीं आ रहा था | भविष्य अंधकारमय था |
          एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट के युवा वैज्ञानिक मोनकोम्बू सांबशिवन स्वामीनाथन (एम. एस. स्वामीनाथन ) के लिए यह एक चुनौती थी | बहुत शोध कार्य के बाद उन्होंने महसूस किया कि गेहूं कि मेक्सिकन बौनी किस्म ही जिसका विकाश अभी - अभी नोबेल पुरस्कार विजेता एन. ई . बोरलॉग ने किया था,  इस समस्या का हल है |
           स्वामीनाथन  की प्रेरणा से बोरलॉग स्थिति का अध्धयन करने भारत आये और कई किस्म की मेक्सिकन बौनी जातियाँ उपलब्ध कराई | वह इस देश में उगाने के योग्य पाई गयीं और देश के अनाज उत्पादन में चमत्कारिक ढंग से उन्नति हुई | एक ही दशक में उत्पादन दुगना हो गया | बोरलॉग की तरह ही स्वामीनाथन को भी भारत में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है |

            स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 में कुम्भ्कोनम नामक शहर में हुआ | उनकी प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु में हुई | उसके बाद वह ब्रिटेन गए और सन 1952  में कैंब्रिज में स्कूल ऑफ़ एग्रीकल्चर से उन्होंने पी. एच .डी. की डिग्री लीं | अगले साल दो दशक उन्होंने भिन्न - भिन्न फसलों पर इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट में व्यावहारिक आनुवंशिकी विज्ञान पर (अप्लाइड जेनेटिक्स)  शोधकार्य करते हुए बिताये | उन्होंने ज्यादा गेहूं और चावल की किस्मों का विकास किया | आलू और जूट में भिन्न जातियों के संकरण का कठिन काम सफलता से किया |
              स्वामीनाथन एक कुशल प्रशासक, और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो एक वैज्ञानिक में दुर्लभ गुण है | वह कई योजनाएं बनाते रहे हैं जिसमे प्रयोगशालाओं में होने वाले शोधकार्यो का लाभ किसान भी उठा सके | उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए आधुनिक तरीके और विधि का उपयोग भी किया है | देश की कृषि क्षमताओं में नया आत्मविश्वास जगाने के लिए सन 1971 में उन्हें रेमन मेग्सेसे अवार्ड मिला | उन्हें एम. एस. भटनागर अवार्ड , बीरबल साहनी मेडल और मेंडल मेमोरियल अवार्ड भी मिल चुके हैं|

        इस समय वह फिलीपींस में इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं |

शुक्रवार, 22 मई 2020

होमी जहाँगीर भाभा

               होमी जहाँगीर भाभा 

 बाह्य अंतरिक्ष से आने वाली अंतरिक्ष किरणों के कण बहुत छोटे - छोटे और  तेज गति से चलने वाले होते हैं | जब  ये कण पृथ्वी के वायुमंडल में  प्रवेश  करते है तो हवा में मौजूद परमाणुओं से टकराकर इलेक्ट्रान की  वर्षा सी करते हैं | सन 1937 में एक भारतीय भौतिक वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा  और डब्लू .हैटलर  ने इन किरणों का रहस्य खोला और दोनों भौतिक विज्ञानी संसार में प्रसिद्ध हो गए |
       भाभा एक कदम और आगे बढे | उन्होंने इलेक्ट्रान की  वर्षा में एक नए आणविक कण की उपश्थिति को पहचाना | इसे उन्होंने मेसॉन नाम दिया |इस कण में उन्हें आइंसटाइन के आपेक्षता के सिद्धांत का प्रायोगिक प्रमाण भी मिला |

     भाभा का जन्म 30 अक्टूबर सन 1909 में एक धनी पारसी परिवार में हुआ था | घर पर विज्ञान की पुस्तकों का एक अच्छा पुस्तकालय था इसलिए बचपन से ही वह विज्ञान में रूचि लेने लगे थे |
         उनके पिता उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते थे और उन्हें उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेज दिया | लेकिन उनकी रूचि भौतिकी में हो गयीं | विदेश में शिक्षा पाते  हुए उन्हें कई मेडल और शिक्षावृत्तियाँ मिली | 
        भाभा को प्रसिद्ध भौतिक शास्त्रियों जैसे एनरिको फर्मी और वुल्फगैंग पाउली के साथ काम करने का अवसर भी मिला |
            सन 1940 में यह युवा भौतिक विज्ञानी अपने देश लौट आया | भाभा ने बंगलौर में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस में कार्य शुरू किया | वहां वे अंतरिक्ष किरणों पर शोध कार्य करने लगे | ऐसे विशाल प्लास्टिक गुब्बारों में जो वापस लाये जा सके उपकरण रखकर उन्हें आकाश में ऊँचा भेजा जाता था|
         इस दौरान भाभा अंतरिक्ष किरणों,प्राथमिक कण और क्वांटम यांत्रिकी जैसे क्षेत्रों में अपने योगदान के लिए रॉयल सोसायटी के सदस्य चुन लिए गए |
       उनकी बाते ऐसी थी की लोग ध्यान देने के लिए बाध्य होते थे | सभी वैज्ञानिको ने उनके एक रिसर्च इंस्टिट्यूट बनाने के विचार का समर्थन किया | भाभा देश के अग्रणी उद्योगपति टाटा परिवार से सम्बंधित थे | सन 1944 में उन्होंने एक पत्र टाटा ट्रस्टीज़ को लिखा और इनसे एक संस्थान बनाने के लिए आग्रह किया |
        सन 1945 में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च नामक संस्था की स्थापना हुई | प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने भाभा को अपनी इच्छानुसार काम करने को कहा | सन 1948 में परमाणु शक्ति आयोग की स्थापना की गयीं और भाभा इसके चैयरमैन बने | तब से आणविक ऊर्जा के प्रयोग और परीक्षणों ने और जोर पकड़ा | भाभा के कुशल निर्देशन में तीन परमाणु रिएक्टरो - अप्सरा,  सिरस,  जरलिना की स्थापना हुई |
               सन 1963 में देश के पहले परमाणु बिजलीघर का निर्माण तारापुर में शुरू हुआ | 18 मई सन 1974 में इसका चरमोत्कर्ष तब हुआ जब भारतीय वैज्ञानिको ने राजस्थान के पोखरण में शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अणु विस्फोट किया | भारत छठा देश था जो नुक्लिएर बिरादरी में खड़ा हुआ |

           भाभा ने इलेक्ट्रॉनिक्स , अंतरिक्ष विज्ञान , रेडियो खगोलविज्ञान, माइक्रोबायोलॉजी में भी प्रयोग किये | ऊटी में लगा रेडियो टेलिस्कोप भाभा की जी देन है | वह परमाणु  शांति के लिए (एटम फॉर पीस ) नाम की कॉन्फ्रेंस के विशिष्ट सदस्य थे | अपनी एक विदेश  यात्रा के दौरान विमान दुर्घटना में 57 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गयीं |
         भाभा की इस आकस्मिक मृत्यु पर सारे देश ने शोक मनाया | सन 1967 में परमाणु शक्ति संस्थान, ट्राम्बे का नाम बदलकर भाभा के समर्पित कार्य के सम्मान व श्रद्धांजलि के रूप में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर रख दिया गया |

जगदीश चंद्र बोस

           जगदीश चंद्र बोस 

10 मई सन 1901 की बात है रॉयल सोसायटी लंदन, का हाल प्रसिद्ध वैज्ञानिको से ठसाठस भरा हुआ था | वे सब जगदीश चंद्र बोस का यह प्रयोग देखने आये थे की पेड़ पौधों में भी संवेदना होती है | उन्होंने जितने प्रयोग परिक्षण किये थे उसमे से एक यह भी था | एक अत्यंत संवेदनशील उपकरण ( बोस का एक अपना आविष्कार ) जो पौधे के स्पंदन मापन के लिए था, एक पौधे से जोड़ दिया गया | पौधे को उसकी जड़ों समेत, तने तक एक ऐसे बर्तन में जिसमे ब्रोमाइड विष भरा था डुबो दिया गया | बोस आशा के साथ स्क्रीन पर हल्के धब्बों को देख रहे थे जो पौधे के स्पंदन का संकेत करते थे | सब लोगो की दृष्टि भी वहीं टिकी थी |
            पौधे के नब्ज की धड़कन, जिसे वह बिंदु पहले घड़ी के पेंडुलम की नियमितता से आगे पीछे अंकित कर रहा था ,धीरे -धीरे अनियमित और असंतुलित होने लगा और फिर एकाएक उसकी क्रियाएं अचानक रुक गयीं | पौधा जहर के कारण मर गया था | 
           इस प्रयोग के अंत में हर्षध्वनि हुई | इस प्रयोग द्वारा बोस ने यह साबित कर दिया कि पौधों में भी जीवन होता है |

        बोस का जन्म 30 नवंबर 1858 में मैमनसिंह जिले में हुआ था यह जिला अब बांग्लादेश में है | बोस का बचपन ऐसे घर में बीता जो भारतीय परम्परा और संस्कृति में डूबा हुआ था |
             जब उन्होंने सेंट जैवियर स्कूल , कलकत्ता में प्रवेश लिया तो उन्हें अंग्रेज और एंग्लो - इंडियन लड़को की संगति मिली | गाँव के लड़के को अपने बीच पाकर उन लोगो को बहुत अजीब लगता था |
       सन 1885 में वह विदेश से बी. एससी . और प्रकृति विज्ञान में ट्रिपास की डिग्री लेकर देश लौटे | उन्हें प्रेसिडेंसी कॉलेज  कलकत्ता में प्राध्यापक पद देने की बात हुई लेकिन उनका वेतन उनके अंग्रेज साथियों से आधा रखा गया | उन्होंने पद तो स्वीकार कर लिया मगर विरोध के तौर पर वेतन लेने से इंकार कर दिया |तीन वर्ष बाद कॉलेज के मुख्य अध्यापक ने जो एक अंग्रेज था, उनकी प्रतिभा को देखकर उनकी मांगे मान लीं |बोस ने इस तरह अन्याय के विरुद्ध कठिन संघर्ष करना सीखा | 
            दो वर्ष के अथक परिश्रम के बाद उन्होंने एक मोनोग्राफ प्रकाशित किया, नाम था -- ' रिस्पांस इन दी लिविंग एंड नॉन लिविंग ' जिसने  रॉयल सोसायटी को आश्वस्त कर दिया की वह ठीक थे | बोस विश्व विख्यात वैज्ञानिक बन गए | कई सम्मानों के अतिरिक्त 1920 में उन्हें रॉयल सोसायटी का सदस्य बना लिया गया | 
      यद्यपि बोस जीव विज्ञानी के रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं लेकिन वह महान भौतिक शास्त्री भी थे | सही अर्थो में बेतार के तार के आविष्कारक वहीं थे | उन्होंने सन 1895 में मारकोनी द्वारा अपने आविष्कार को पेटेंट कराने से भी एक वर्ष पहले ही वह इस उपकरण का सार्वजनिक प्रदर्शन कर चुके थे| वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने माइक्रो वेव्स का उपयोग किया |
      बोस ने ही अति संवेदनशील कोहियरर उपकरण बनाया जो रेडियो वेव्स का पता लगाता है | बाद में बोस ने क्रेस्कोग्राफ का आविष्कार किया जो पौधों की  वृद्धि का पता लगाता है |
       बोस ने 23नवंबर सन 1937 को अपनी मृत्यु से पहले कलकत्ता में बोस इंस्टिट्यूट की स्थापना की | उस समय यहाँ मुख्यतः पौधों पर ही अध्ययन किया जाता था | आजकल इंस्टिट्यूट में कई सम्बंधित विषयों पर शोध कार्य चल रहा है |