भारतीय वैज्ञानिक

रविवार, 24 मई 2020

एम. एस. स्वामीनाथन

             एम. एस. स्वामीनाथन 

छठे दशक के अंत में देश में खाद्य उत्पादन मांग से काफी कम था | इस समस्या का कोई हल नजर नहीं आ रहा था | भविष्य अंधकारमय था |
          एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट के युवा वैज्ञानिक मोनकोम्बू सांबशिवन स्वामीनाथन (एम. एस. स्वामीनाथन ) के लिए यह एक चुनौती थी | बहुत शोध कार्य के बाद उन्होंने महसूस किया कि गेहूं कि मेक्सिकन बौनी किस्म ही जिसका विकाश अभी - अभी नोबेल पुरस्कार विजेता एन. ई . बोरलॉग ने किया था,  इस समस्या का हल है |
           स्वामीनाथन  की प्रेरणा से बोरलॉग स्थिति का अध्धयन करने भारत आये और कई किस्म की मेक्सिकन बौनी जातियाँ उपलब्ध कराई | वह इस देश में उगाने के योग्य पाई गयीं और देश के अनाज उत्पादन में चमत्कारिक ढंग से उन्नति हुई | एक ही दशक में उत्पादन दुगना हो गया | बोरलॉग की तरह ही स्वामीनाथन को भी भारत में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है |

            स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 में कुम्भ्कोनम नामक शहर में हुआ | उनकी प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु में हुई | उसके बाद वह ब्रिटेन गए और सन 1952  में कैंब्रिज में स्कूल ऑफ़ एग्रीकल्चर से उन्होंने पी. एच .डी. की डिग्री लीं | अगले साल दो दशक उन्होंने भिन्न - भिन्न फसलों पर इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट में व्यावहारिक आनुवंशिकी विज्ञान पर (अप्लाइड जेनेटिक्स)  शोधकार्य करते हुए बिताये | उन्होंने ज्यादा गेहूं और चावल की किस्मों का विकास किया | आलू और जूट में भिन्न जातियों के संकरण का कठिन काम सफलता से किया |
              स्वामीनाथन एक कुशल प्रशासक, और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो एक वैज्ञानिक में दुर्लभ गुण है | वह कई योजनाएं बनाते रहे हैं जिसमे प्रयोगशालाओं में होने वाले शोधकार्यो का लाभ किसान भी उठा सके | उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए आधुनिक तरीके और विधि का उपयोग भी किया है | देश की कृषि क्षमताओं में नया आत्मविश्वास जगाने के लिए सन 1971 में उन्हें रेमन मेग्सेसे अवार्ड मिला | उन्हें एम. एस. भटनागर अवार्ड , बीरबल साहनी मेडल और मेंडल मेमोरियल अवार्ड भी मिल चुके हैं|

        इस समय वह फिलीपींस में इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं |

शुक्रवार, 22 मई 2020

होमी जहाँगीर भाभा

               होमी जहाँगीर भाभा 

 बाह्य अंतरिक्ष से आने वाली अंतरिक्ष किरणों के कण बहुत छोटे - छोटे और  तेज गति से चलने वाले होते हैं | जब  ये कण पृथ्वी के वायुमंडल में  प्रवेश  करते है तो हवा में मौजूद परमाणुओं से टकराकर इलेक्ट्रान की  वर्षा सी करते हैं | सन 1937 में एक भारतीय भौतिक वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा  और डब्लू .हैटलर  ने इन किरणों का रहस्य खोला और दोनों भौतिक विज्ञानी संसार में प्रसिद्ध हो गए |
       भाभा एक कदम और आगे बढे | उन्होंने इलेक्ट्रान की  वर्षा में एक नए आणविक कण की उपश्थिति को पहचाना | इसे उन्होंने मेसॉन नाम दिया |इस कण में उन्हें आइंसटाइन के आपेक्षता के सिद्धांत का प्रायोगिक प्रमाण भी मिला |

     भाभा का जन्म 30 अक्टूबर सन 1909 में एक धनी पारसी परिवार में हुआ था | घर पर विज्ञान की पुस्तकों का एक अच्छा पुस्तकालय था इसलिए बचपन से ही वह विज्ञान में रूचि लेने लगे थे |
         उनके पिता उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते थे और उन्हें उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेज दिया | लेकिन उनकी रूचि भौतिकी में हो गयीं | विदेश में शिक्षा पाते  हुए उन्हें कई मेडल और शिक्षावृत्तियाँ मिली | 
        भाभा को प्रसिद्ध भौतिक शास्त्रियों जैसे एनरिको फर्मी और वुल्फगैंग पाउली के साथ काम करने का अवसर भी मिला |
            सन 1940 में यह युवा भौतिक विज्ञानी अपने देश लौट आया | भाभा ने बंगलौर में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस में कार्य शुरू किया | वहां वे अंतरिक्ष किरणों पर शोध कार्य करने लगे | ऐसे विशाल प्लास्टिक गुब्बारों में जो वापस लाये जा सके उपकरण रखकर उन्हें आकाश में ऊँचा भेजा जाता था|
         इस दौरान भाभा अंतरिक्ष किरणों,प्राथमिक कण और क्वांटम यांत्रिकी जैसे क्षेत्रों में अपने योगदान के लिए रॉयल सोसायटी के सदस्य चुन लिए गए |
       उनकी बाते ऐसी थी की लोग ध्यान देने के लिए बाध्य होते थे | सभी वैज्ञानिको ने उनके एक रिसर्च इंस्टिट्यूट बनाने के विचार का समर्थन किया | भाभा देश के अग्रणी उद्योगपति टाटा परिवार से सम्बंधित थे | सन 1944 में उन्होंने एक पत्र टाटा ट्रस्टीज़ को लिखा और इनसे एक संस्थान बनाने के लिए आग्रह किया |
        सन 1945 में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च नामक संस्था की स्थापना हुई | प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने भाभा को अपनी इच्छानुसार काम करने को कहा | सन 1948 में परमाणु शक्ति आयोग की स्थापना की गयीं और भाभा इसके चैयरमैन बने | तब से आणविक ऊर्जा के प्रयोग और परीक्षणों ने और जोर पकड़ा | भाभा के कुशल निर्देशन में तीन परमाणु रिएक्टरो - अप्सरा,  सिरस,  जरलिना की स्थापना हुई |
               सन 1963 में देश के पहले परमाणु बिजलीघर का निर्माण तारापुर में शुरू हुआ | 18 मई सन 1974 में इसका चरमोत्कर्ष तब हुआ जब भारतीय वैज्ञानिको ने राजस्थान के पोखरण में शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अणु विस्फोट किया | भारत छठा देश था जो नुक्लिएर बिरादरी में खड़ा हुआ |

           भाभा ने इलेक्ट्रॉनिक्स , अंतरिक्ष विज्ञान , रेडियो खगोलविज्ञान, माइक्रोबायोलॉजी में भी प्रयोग किये | ऊटी में लगा रेडियो टेलिस्कोप भाभा की जी देन है | वह परमाणु  शांति के लिए (एटम फॉर पीस ) नाम की कॉन्फ्रेंस के विशिष्ट सदस्य थे | अपनी एक विदेश  यात्रा के दौरान विमान दुर्घटना में 57 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गयीं |
         भाभा की इस आकस्मिक मृत्यु पर सारे देश ने शोक मनाया | सन 1967 में परमाणु शक्ति संस्थान, ट्राम्बे का नाम बदलकर भाभा के समर्पित कार्य के सम्मान व श्रद्धांजलि के रूप में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर रख दिया गया |

जगदीश चंद्र बोस

           जगदीश चंद्र बोस 

10 मई सन 1901 की बात है रॉयल सोसायटी लंदन, का हाल प्रसिद्ध वैज्ञानिको से ठसाठस भरा हुआ था | वे सब जगदीश चंद्र बोस का यह प्रयोग देखने आये थे की पेड़ पौधों में भी संवेदना होती है | उन्होंने जितने प्रयोग परिक्षण किये थे उसमे से एक यह भी था | एक अत्यंत संवेदनशील उपकरण ( बोस का एक अपना आविष्कार ) जो पौधे के स्पंदन मापन के लिए था, एक पौधे से जोड़ दिया गया | पौधे को उसकी जड़ों समेत, तने तक एक ऐसे बर्तन में जिसमे ब्रोमाइड विष भरा था डुबो दिया गया | बोस आशा के साथ स्क्रीन पर हल्के धब्बों को देख रहे थे जो पौधे के स्पंदन का संकेत करते थे | सब लोगो की दृष्टि भी वहीं टिकी थी |
            पौधे के नब्ज की धड़कन, जिसे वह बिंदु पहले घड़ी के पेंडुलम की नियमितता से आगे पीछे अंकित कर रहा था ,धीरे -धीरे अनियमित और असंतुलित होने लगा और फिर एकाएक उसकी क्रियाएं अचानक रुक गयीं | पौधा जहर के कारण मर गया था | 
           इस प्रयोग के अंत में हर्षध्वनि हुई | इस प्रयोग द्वारा बोस ने यह साबित कर दिया कि पौधों में भी जीवन होता है |

        बोस का जन्म 30 नवंबर 1858 में मैमनसिंह जिले में हुआ था यह जिला अब बांग्लादेश में है | बोस का बचपन ऐसे घर में बीता जो भारतीय परम्परा और संस्कृति में डूबा हुआ था |
             जब उन्होंने सेंट जैवियर स्कूल , कलकत्ता में प्रवेश लिया तो उन्हें अंग्रेज और एंग्लो - इंडियन लड़को की संगति मिली | गाँव के लड़के को अपने बीच पाकर उन लोगो को बहुत अजीब लगता था |
       सन 1885 में वह विदेश से बी. एससी . और प्रकृति विज्ञान में ट्रिपास की डिग्री लेकर देश लौटे | उन्हें प्रेसिडेंसी कॉलेज  कलकत्ता में प्राध्यापक पद देने की बात हुई लेकिन उनका वेतन उनके अंग्रेज साथियों से आधा रखा गया | उन्होंने पद तो स्वीकार कर लिया मगर विरोध के तौर पर वेतन लेने से इंकार कर दिया |तीन वर्ष बाद कॉलेज के मुख्य अध्यापक ने जो एक अंग्रेज था, उनकी प्रतिभा को देखकर उनकी मांगे मान लीं |बोस ने इस तरह अन्याय के विरुद्ध कठिन संघर्ष करना सीखा | 
            दो वर्ष के अथक परिश्रम के बाद उन्होंने एक मोनोग्राफ प्रकाशित किया, नाम था -- ' रिस्पांस इन दी लिविंग एंड नॉन लिविंग ' जिसने  रॉयल सोसायटी को आश्वस्त कर दिया की वह ठीक थे | बोस विश्व विख्यात वैज्ञानिक बन गए | कई सम्मानों के अतिरिक्त 1920 में उन्हें रॉयल सोसायटी का सदस्य बना लिया गया | 
      यद्यपि बोस जीव विज्ञानी के रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं लेकिन वह महान भौतिक शास्त्री भी थे | सही अर्थो में बेतार के तार के आविष्कारक वहीं थे | उन्होंने सन 1895 में मारकोनी द्वारा अपने आविष्कार को पेटेंट कराने से भी एक वर्ष पहले ही वह इस उपकरण का सार्वजनिक प्रदर्शन कर चुके थे| वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने माइक्रो वेव्स का उपयोग किया |
      बोस ने ही अति संवेदनशील कोहियरर उपकरण बनाया जो रेडियो वेव्स का पता लगाता है | बाद में बोस ने क्रेस्कोग्राफ का आविष्कार किया जो पौधों की  वृद्धि का पता लगाता है |
       बोस ने 23नवंबर सन 1937 को अपनी मृत्यु से पहले कलकत्ता में बोस इंस्टिट्यूट की स्थापना की | उस समय यहाँ मुख्यतः पौधों पर ही अध्ययन किया जाता था | आजकल इंस्टिट्यूट में कई सम्बंधित विषयों पर शोध कार्य चल रहा है |