एम. एस. स्वामीनाथन
छठे दशक के अंत में देश में खाद्य उत्पादन मांग से काफी कम था | इस समस्या का कोई हल नजर नहीं आ रहा था | भविष्य अंधकारमय था |
एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट के युवा वैज्ञानिक मोनकोम्बू सांबशिवन स्वामीनाथन (एम. एस. स्वामीनाथन ) के लिए यह एक चुनौती थी | बहुत शोध कार्य के बाद उन्होंने महसूस किया कि गेहूं कि मेक्सिकन बौनी किस्म ही जिसका विकाश अभी - अभी नोबेल पुरस्कार विजेता एन. ई . बोरलॉग ने किया था, इस समस्या का हल है |
स्वामीनाथन की प्रेरणा से बोरलॉग स्थिति का अध्धयन करने भारत आये और कई किस्म की मेक्सिकन बौनी जातियाँ उपलब्ध कराई | वह इस देश में उगाने के योग्य पाई गयीं और देश के अनाज उत्पादन में चमत्कारिक ढंग से उन्नति हुई | एक ही दशक में उत्पादन दुगना हो गया | बोरलॉग की तरह ही स्वामीनाथन को भी भारत में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है |
स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 में कुम्भ्कोनम नामक शहर में हुआ | उनकी प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु में हुई | उसके बाद वह ब्रिटेन गए और सन 1952 में कैंब्रिज में स्कूल ऑफ़ एग्रीकल्चर से उन्होंने पी. एच .डी. की डिग्री लीं | अगले साल दो दशक उन्होंने भिन्न - भिन्न फसलों पर इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट में व्यावहारिक आनुवंशिकी विज्ञान पर (अप्लाइड जेनेटिक्स) शोधकार्य करते हुए बिताये | उन्होंने ज्यादा गेहूं और चावल की किस्मों का विकास किया | आलू और जूट में भिन्न जातियों के संकरण का कठिन काम सफलता से किया |
स्वामीनाथन एक कुशल प्रशासक, और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो एक वैज्ञानिक में दुर्लभ गुण है | वह कई योजनाएं बनाते रहे हैं जिसमे प्रयोगशालाओं में होने वाले शोधकार्यो का लाभ किसान भी उठा सके | उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए आधुनिक तरीके और विधि का उपयोग भी किया है | देश की कृषि क्षमताओं में नया आत्मविश्वास जगाने के लिए सन 1971 में उन्हें रेमन मेग्सेसे अवार्ड मिला | उन्हें एम. एस. भटनागर अवार्ड , बीरबल साहनी मेडल और मेंडल मेमोरियल अवार्ड भी मिल चुके हैं|
इस समय वह फिलीपींस में इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं |
छठे दशक के अंत में देश में खाद्य उत्पादन मांग से काफी कम था | इस समस्या का कोई हल नजर नहीं आ रहा था | भविष्य अंधकारमय था |
एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट के युवा वैज्ञानिक मोनकोम्बू सांबशिवन स्वामीनाथन (एम. एस. स्वामीनाथन ) के लिए यह एक चुनौती थी | बहुत शोध कार्य के बाद उन्होंने महसूस किया कि गेहूं कि मेक्सिकन बौनी किस्म ही जिसका विकाश अभी - अभी नोबेल पुरस्कार विजेता एन. ई . बोरलॉग ने किया था, इस समस्या का हल है |
स्वामीनाथन की प्रेरणा से बोरलॉग स्थिति का अध्धयन करने भारत आये और कई किस्म की मेक्सिकन बौनी जातियाँ उपलब्ध कराई | वह इस देश में उगाने के योग्य पाई गयीं और देश के अनाज उत्पादन में चमत्कारिक ढंग से उन्नति हुई | एक ही दशक में उत्पादन दुगना हो गया | बोरलॉग की तरह ही स्वामीनाथन को भी भारत में हरित क्रांति का जनक कहा जाता है |
स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 में कुम्भ्कोनम नामक शहर में हुआ | उनकी प्रारंभिक शिक्षा तमिलनाडु में हुई | उसके बाद वह ब्रिटेन गए और सन 1952 में कैंब्रिज में स्कूल ऑफ़ एग्रीकल्चर से उन्होंने पी. एच .डी. की डिग्री लीं | अगले साल दो दशक उन्होंने भिन्न - भिन्न फसलों पर इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट में व्यावहारिक आनुवंशिकी विज्ञान पर (अप्लाइड जेनेटिक्स) शोधकार्य करते हुए बिताये | उन्होंने ज्यादा गेहूं और चावल की किस्मों का विकास किया | आलू और जूट में भिन्न जातियों के संकरण का कठिन काम सफलता से किया |
स्वामीनाथन एक कुशल प्रशासक, और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो एक वैज्ञानिक में दुर्लभ गुण है | वह कई योजनाएं बनाते रहे हैं जिसमे प्रयोगशालाओं में होने वाले शोधकार्यो का लाभ किसान भी उठा सके | उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए आधुनिक तरीके और विधि का उपयोग भी किया है | देश की कृषि क्षमताओं में नया आत्मविश्वास जगाने के लिए सन 1971 में उन्हें रेमन मेग्सेसे अवार्ड मिला | उन्हें एम. एस. भटनागर अवार्ड , बीरबल साहनी मेडल और मेंडल मेमोरियल अवार्ड भी मिल चुके हैं|
इस समय वह फिलीपींस में इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं |




